Saturday, March 12, 2016

4>गणेश जी को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?=3000 फ़ीट की गणेश प्रतिमा+भगवान गणेश को क्यों नहीचढ़ाई जाती है तुलसी?

4>|| श्री गणेश जी को दूर्वा  क्यो चडाते हैं  ( 1 to 3  ) 
1>------------------गणेश जी को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?
2>------------------अदभुत गणेश प्रतिमा – दंतेवाड़ा में 3000 फ़ीट की ऊँचाई पर 
                             स्थापित 10 वि सदी की गणेश प्रतिमा -
3>------------------भगवान गणेश को क्यों नही चढ़ाई जाती है तुलसी?
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1>गणेश जी को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?
: दूर्वा यानि दूब यह एक तरह की घास होती है जो गणेश पूजन में प्रयोग होती है। एक मात्र गणेश ही ऐसे देव है जिनको यह चढ़ाई जाती है। दूर्वा गणेशजी को अतिशय प्रिय है। इक्कीस दूर्वा को इक्कठी कर एक गांठ बनाई जाती है तथा कुल 21 गांठ गणेशजी को मस्तक पर चढ़ाई जाती है। लेकिन आखिर क्यों दूर्वा की 21 गांठे गणेशजी को चढ़ाई जाती है इसके लिए पुराणों में एक कथा है।

पौराणिक कथा :

कथा के अनुसार प्राचीन काल में अनलासुर नाम का एक दैत्य था। इस दैत्य के कोप से स्वर्ग और धरती पर त्राही-त्राही मची हुई थी। अनलासुर ऋषि-मुनियों और आम लोगों को जिंदा निगल जाता था। दैत्य से त्रस्त होकर देवराज इंद्र सहित सभी देवी-देवता और प्रमुख ऋषि-मुनि महादेव से प्रार्थना करने पहुंचे। सभी ने शिवजी से प्रार्थना की कि वे अनलासुर के आतंक का नाश करें।
शिवजी ने सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों की प्रार्थना सुनकर कहा कि अनलासुर का अंत केवल श्रीगणेश ही कर सकते हैं।
जब श्रीगणेश ने अनलासुर को निगला तो उनके पेट में बहुत जलन होने लगी। कई प्रकार के उपाय करने के बाद भी गणेशजी के पेट की जलन शांत नहीं हो रही थी। तब कश्यप ऋषि ने दूर्वा की 21 गांठ बनाकर श्रीगणेश को खाने को दी। जब गणेशजी ने दूर्वा ग्रहण की तो उनके पेट की जलन शांत हो गई। तभी से श्रीगणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई।
दूर्वा चढ़ाते वक़्त बोले मन्त्र :

गणेश जी को 21 दूर्वा चढ़ाते वक्त नीचे लिखे 10 मंत्रों को बोलें यानी हर मंत्र के साथ दो दूर्वा चढ़ाएं और आखिरी बची दूर्वा चढ़ाते वक्त सभी मंत्र बोलें।
ॐ गणाधिपाय नमः ,ॐ उमापुत्राय नमः ,ॐ विघ्ननाशनाय नमः ,ॐ विनायकाय नमः
ॐ ईशपुत्राय नमः ,ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः ,ॐ एकदन्ताय नमः ,ॐ इभवक्त्राय नमः
ॐ मूषकवाहनाय नमः ,ॐ कुमारगुरवे नमः
औषधि है दूर्वा :

इस कथा द्वारा हमे यह संदेश प्राप्त होता है की पेट की जलन, तथा पेट के रोगों के लिए दूर्वा औषधि का कार्य करती है। मानसिक शांति के लिए यह बहुत लाभप्रद है। यह विभिन्न बीमारियों में एंटिबायोटिक का काम करती है, उसको देखने और छूने से मानसिक शांति मिलती है और जलन शांत होती है। वैज्ञानिको ने अपने शोध में पाया है कि कैंसर रोगियों के लिए भी यह लाभप्रद है।
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2>अदभुत गणेश प्रतिमा – दंतेवाड़ा में 3000 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थापित 10 वि सदी की गणेश प्रतिमा -

पहले पुरातत्व विभाग ने छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 30 किलो मीटर दूर दुर्गम ढोल कल की पहाड़ियों पर 3000 फ़ीट की ऊंचाई पर सैकड़ों साल पुरानी, नागवंशीय राजाओं द्वारा स्थापित एक भव्य गणेश प्रतिमा की खोज की जो की लोगो के आश्चर्य का कारण बनी हुई है। लोग यह नहीं समझ पा रहे की सदियों पहले इतने दुर्गम इलाके में इतनी ऊंचाई पर आखिर क्यों गणेश प्रतिमा की स्थापना की गई ? यहाँ पर पहुँचाना आज भी बहुत जोखिम भरा काम है तो उस ज़माने में तो यह और भी जोखिम भरा रहा होगा। तो फिर कैसे और क्यों यह गणेश प्रतिमा स्थापित की गई ? पुरात्वविदों का एक अनुमान यह है की दंतेवाड़ा क्षेत्र के रक्षक के रूप नागवंशियों ने गणेश जी यहाँ स्थापना की थी।

भव्य है गणेश प्रतिमा : पहाड़ी पर स्थापित 6 फीट ऊंची 21/2 फीट चौड़ी ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित यह प्रतिमा वास्तुकला की दृष्टि से अत्यन्त कलात्मक है। गणपति की इस प्रतिमा में ऊपरी दांये हाथ में फरसा, ऊपरी बांये हाथ में टूटा हुआ एक दंत, नीचे दांये हाथ में अभय मुद्रा में अक्षमाला धारण किए हुए तथा नीचे बांये हाथ में मोदक धारण किए हुए आयुध के रूप में विराजित है। पुरात्वविदों के मुताबिक इस प्रकार की प्रतिमा बस्तर क्षेत्र में कहीं नहीं मिलती है। -
गणेश जी का एक दांत टूटने से सम्बंधित पौराणिक कथा :
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार परशुराम जी शिवजी से मिलने कैलाश पर्वत गए। उस समय शिवजी विश्राम में थे। गणेश जी उनके रक्षक के रूप में विराजमान थे। गणेश जी ने परशुराम जी को शिवजी से मिलने से रोका तो परशुराम जी क्रोधित हो गए और गुस्से में उन्होंने अपने फरसे से गणेश जी का एक दांत काट दिया तब से गणेश जी एकदंत कहलाए।

गणेश और परशुराम में यही हुआ हुआ था युद्ध :
दंतेश का क्षेत्र (वाड़ा) को दंतेवाड़ा कहा जाता है। इस क्षेत्र में एक कैलाश गुफा भी है। इस क्षेत्र से सम्बंधित एक किंवदंती यह चली आ रही है कि यह वही कैलाश क्षेत्र है जहां पर गणेश एवं परशुराम के मध्य युद्ध हुआ था। यही कारण है कि दंतेवाड़ा से ढोल कल पहुंचने के मार्ग में एक ग्राम परस पाल मिलता है, जो परशुराम के नाम से जाना जाता है। इसके आगे ग्राम कोतवाल पारा आता है। कोतवाल अर्थात् रक्षक के रूप में गणेश जी का क्षेत्र होने की जानकारी मिलती है।


गुफा के अंदर का एक सीन।

दंतेवाड़ा क्षेत्र की रक्षक है यह गणेश प्रतिमा :
पुरात्वविदों के मुताबिक इस विशाल प्रतिमा को दंतेवाड़ा क्षेत्र रक्षक के रूप में पहाड़ी के चोटी पर स्थापित किया गया होगा। गणेश जी के आयुध के रूप में फरसा इसकी पुष्टि करता है। यहीं कारण है कि उन्हें नागवंशी शासकों ने इतनी ऊंची पहाड़ी पर स्थापित किया था। नागवंशी शासकों ने इस मूर्ति के निर्माण करते समय एक चिन्ह अवश्य मूर्ति पर अंकित कर दिया है। गणेश जी के उदर पर नाग का अंकन। गणेश जी अपना संतुलन बनाए रखे, इसीलिए शिल्पकार ने जनेऊ में संकल का उपयोग किया है। कला की दृष्टि से 10-11 शताब्दी की (नागवंशी) प्रतिमा कही जा सकती है।
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3>भगवान गणेश को क्यों नही चढ़ाई जाती है तुलसी?

भगवान गणेश को उनके पिता महादेव ने अपने ही पुत्र की हत्या के एवज में प्रथम पूजनीय होने का वरदान मिला था, हालाँकि गनेश वध के पीछे एक असुर को मारने का प्रयोजन भी था. तब से उनकी सबसे पहले पूजा होती है बाकि की बाद में लेकिन गणेश को भोग लगते समय उसपे तुलसी नही छढती है जबकि बाकि देवो में तुलसी के बिना भोग नही लगता है.

आप हमेशा से ही इस परंपरा को निभाते आये होंगे या अपने अपने बड़ो को ऐसा करते देखा होगा लेकिन कभी आपने उनसे इसका कारण न पूछा होगा. आज के बाद आप उनसे ये कारण पूछे शायद उन्हें भी न मालूम हो लेकिन आज से आपको पता हो जायेगा.

भगवान गणेश बालब्रह्मचारी थे और उनका शादी का कोई इरादा नही था लेकिन एक दिन वृंदा नाम की एक दक्ष कन्या ने उन्हें देखा और उनपे मोहित हो गई. लगे हाथो ही उसने गणेश जी से विवाह की इच्छा जता दी जिसे गणेश ने अपने ब्रह्मचारी होने के चलते सिरे से ख़ारिज कर दिया, इस पर वृंदा ने गणेश को एक नहीं बल्कि दो शादिया होने का श्राप दे डाला.

लेकिन तब गणेश ने भी उसके ऐसे श्राप पर वृंदा को श्राप दिया की उसकी शादी एक असुर से होगी, तब गणेश की शादी ऋद्धि सिद्दी से हुई और वृंदा की शादी जालंधर नाम के असुर से. जालंधर को मारने के लिए विष्णु ने जी जालंधर का रूप धरा और वृंदा का सतीत्व भंग किया.

तब वृन्दा अपने पति के साथ सती हो गई और उसकी चिता के स्थान पर तुलसी के पौधे उगे जिनसे विष्णु के पत्थर रूपी रूप शालिग्राम का विवाह किया जाता है. तब से वृंदा तुलसी हो गई और वृंदा और गणेश जी के बीच में वैर होने से तुलसी गणेश जी को अर्पित नही होती है ऐसा करने से लम्बोदर रुष्ट हो सकते है.

रुष्ट इसलिए क्योंकि वो तुलसी ही थी जिसने गणेश के ब्रह्मचर्य का व्रत टूटने के लिए श्राप दिया था, श्रीगणेश को दूर्वा यानि घास चढ़ाई जाती है जो की उन्हें एक बूटी के रूप दुर्वासा ने दी थी

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