Saturday, March 12, 2016

4>गणेश जी को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?=3000 फ़ीट की गणेश प्रतिमा+भगवान गणेश को क्यों नहीचढ़ाई जाती है तुलसी?

4>|| श्री गणेश जी को दूर्वा  क्यो चडाते हैं  ( 1 to 3  ) 
1>------------------गणेश जी को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?
2>------------------अदभुत गणेश प्रतिमा – दंतेवाड़ा में 3000 फ़ीट की ऊँचाई पर 
                             स्थापित 10 वि सदी की गणेश प्रतिमा -
3>------------------भगवान गणेश को क्यों नही चढ़ाई जाती है तुलसी?
*********************************************************************************

1>गणेश जी को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?
: दूर्वा यानि दूब यह एक तरह की घास होती है जो गणेश पूजन में प्रयोग होती है। एक मात्र गणेश ही ऐसे देव है जिनको यह चढ़ाई जाती है। दूर्वा गणेशजी को अतिशय प्रिय है। इक्कीस दूर्वा को इक्कठी कर एक गांठ बनाई जाती है तथा कुल 21 गांठ गणेशजी को मस्तक पर चढ़ाई जाती है। लेकिन आखिर क्यों दूर्वा की 21 गांठे गणेशजी को चढ़ाई जाती है इसके लिए पुराणों में एक कथा है।

पौराणिक कथा :

कथा के अनुसार प्राचीन काल में अनलासुर नाम का एक दैत्य था। इस दैत्य के कोप से स्वर्ग और धरती पर त्राही-त्राही मची हुई थी। अनलासुर ऋषि-मुनियों और आम लोगों को जिंदा निगल जाता था। दैत्य से त्रस्त होकर देवराज इंद्र सहित सभी देवी-देवता और प्रमुख ऋषि-मुनि महादेव से प्रार्थना करने पहुंचे। सभी ने शिवजी से प्रार्थना की कि वे अनलासुर के आतंक का नाश करें।
शिवजी ने सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों की प्रार्थना सुनकर कहा कि अनलासुर का अंत केवल श्रीगणेश ही कर सकते हैं।
जब श्रीगणेश ने अनलासुर को निगला तो उनके पेट में बहुत जलन होने लगी। कई प्रकार के उपाय करने के बाद भी गणेशजी के पेट की जलन शांत नहीं हो रही थी। तब कश्यप ऋषि ने दूर्वा की 21 गांठ बनाकर श्रीगणेश को खाने को दी। जब गणेशजी ने दूर्वा ग्रहण की तो उनके पेट की जलन शांत हो गई। तभी से श्रीगणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई।
दूर्वा चढ़ाते वक़्त बोले मन्त्र :

गणेश जी को 21 दूर्वा चढ़ाते वक्त नीचे लिखे 10 मंत्रों को बोलें यानी हर मंत्र के साथ दो दूर्वा चढ़ाएं और आखिरी बची दूर्वा चढ़ाते वक्त सभी मंत्र बोलें।
ॐ गणाधिपाय नमः ,ॐ उमापुत्राय नमः ,ॐ विघ्ननाशनाय नमः ,ॐ विनायकाय नमः
ॐ ईशपुत्राय नमः ,ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः ,ॐ एकदन्ताय नमः ,ॐ इभवक्त्राय नमः
ॐ मूषकवाहनाय नमः ,ॐ कुमारगुरवे नमः
औषधि है दूर्वा :

इस कथा द्वारा हमे यह संदेश प्राप्त होता है की पेट की जलन, तथा पेट के रोगों के लिए दूर्वा औषधि का कार्य करती है। मानसिक शांति के लिए यह बहुत लाभप्रद है। यह विभिन्न बीमारियों में एंटिबायोटिक का काम करती है, उसको देखने और छूने से मानसिक शांति मिलती है और जलन शांत होती है। वैज्ञानिको ने अपने शोध में पाया है कि कैंसर रोगियों के लिए भी यह लाभप्रद है।
========================================================================
2>अदभुत गणेश प्रतिमा – दंतेवाड़ा में 3000 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थापित 10 वि सदी की गणेश प्रतिमा -

पहले पुरातत्व विभाग ने छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 30 किलो मीटर दूर दुर्गम ढोल कल की पहाड़ियों पर 3000 फ़ीट की ऊंचाई पर सैकड़ों साल पुरानी, नागवंशीय राजाओं द्वारा स्थापित एक भव्य गणेश प्रतिमा की खोज की जो की लोगो के आश्चर्य का कारण बनी हुई है। लोग यह नहीं समझ पा रहे की सदियों पहले इतने दुर्गम इलाके में इतनी ऊंचाई पर आखिर क्यों गणेश प्रतिमा की स्थापना की गई ? यहाँ पर पहुँचाना आज भी बहुत जोखिम भरा काम है तो उस ज़माने में तो यह और भी जोखिम भरा रहा होगा। तो फिर कैसे और क्यों यह गणेश प्रतिमा स्थापित की गई ? पुरात्वविदों का एक अनुमान यह है की दंतेवाड़ा क्षेत्र के रक्षक के रूप नागवंशियों ने गणेश जी यहाँ स्थापना की थी।

भव्य है गणेश प्रतिमा : पहाड़ी पर स्थापित 6 फीट ऊंची 21/2 फीट चौड़ी ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित यह प्रतिमा वास्तुकला की दृष्टि से अत्यन्त कलात्मक है। गणपति की इस प्रतिमा में ऊपरी दांये हाथ में फरसा, ऊपरी बांये हाथ में टूटा हुआ एक दंत, नीचे दांये हाथ में अभय मुद्रा में अक्षमाला धारण किए हुए तथा नीचे बांये हाथ में मोदक धारण किए हुए आयुध के रूप में विराजित है। पुरात्वविदों के मुताबिक इस प्रकार की प्रतिमा बस्तर क्षेत्र में कहीं नहीं मिलती है। -
गणेश जी का एक दांत टूटने से सम्बंधित पौराणिक कथा :
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार परशुराम जी शिवजी से मिलने कैलाश पर्वत गए। उस समय शिवजी विश्राम में थे। गणेश जी उनके रक्षक के रूप में विराजमान थे। गणेश जी ने परशुराम जी को शिवजी से मिलने से रोका तो परशुराम जी क्रोधित हो गए और गुस्से में उन्होंने अपने फरसे से गणेश जी का एक दांत काट दिया तब से गणेश जी एकदंत कहलाए।

गणेश और परशुराम में यही हुआ हुआ था युद्ध :
दंतेश का क्षेत्र (वाड़ा) को दंतेवाड़ा कहा जाता है। इस क्षेत्र में एक कैलाश गुफा भी है। इस क्षेत्र से सम्बंधित एक किंवदंती यह चली आ रही है कि यह वही कैलाश क्षेत्र है जहां पर गणेश एवं परशुराम के मध्य युद्ध हुआ था। यही कारण है कि दंतेवाड़ा से ढोल कल पहुंचने के मार्ग में एक ग्राम परस पाल मिलता है, जो परशुराम के नाम से जाना जाता है। इसके आगे ग्राम कोतवाल पारा आता है। कोतवाल अर्थात् रक्षक के रूप में गणेश जी का क्षेत्र होने की जानकारी मिलती है।


गुफा के अंदर का एक सीन।

दंतेवाड़ा क्षेत्र की रक्षक है यह गणेश प्रतिमा :
पुरात्वविदों के मुताबिक इस विशाल प्रतिमा को दंतेवाड़ा क्षेत्र रक्षक के रूप में पहाड़ी के चोटी पर स्थापित किया गया होगा। गणेश जी के आयुध के रूप में फरसा इसकी पुष्टि करता है। यहीं कारण है कि उन्हें नागवंशी शासकों ने इतनी ऊंची पहाड़ी पर स्थापित किया था। नागवंशी शासकों ने इस मूर्ति के निर्माण करते समय एक चिन्ह अवश्य मूर्ति पर अंकित कर दिया है। गणेश जी के उदर पर नाग का अंकन। गणेश जी अपना संतुलन बनाए रखे, इसीलिए शिल्पकार ने जनेऊ में संकल का उपयोग किया है। कला की दृष्टि से 10-11 शताब्दी की (नागवंशी) प्रतिमा कही जा सकती है।
==================================================================
3>भगवान गणेश को क्यों नही चढ़ाई जाती है तुलसी?

भगवान गणेश को उनके पिता महादेव ने अपने ही पुत्र की हत्या के एवज में प्रथम पूजनीय होने का वरदान मिला था, हालाँकि गनेश वध के पीछे एक असुर को मारने का प्रयोजन भी था. तब से उनकी सबसे पहले पूजा होती है बाकि की बाद में लेकिन गणेश को भोग लगते समय उसपे तुलसी नही छढती है जबकि बाकि देवो में तुलसी के बिना भोग नही लगता है.

आप हमेशा से ही इस परंपरा को निभाते आये होंगे या अपने अपने बड़ो को ऐसा करते देखा होगा लेकिन कभी आपने उनसे इसका कारण न पूछा होगा. आज के बाद आप उनसे ये कारण पूछे शायद उन्हें भी न मालूम हो लेकिन आज से आपको पता हो जायेगा.

भगवान गणेश बालब्रह्मचारी थे और उनका शादी का कोई इरादा नही था लेकिन एक दिन वृंदा नाम की एक दक्ष कन्या ने उन्हें देखा और उनपे मोहित हो गई. लगे हाथो ही उसने गणेश जी से विवाह की इच्छा जता दी जिसे गणेश ने अपने ब्रह्मचारी होने के चलते सिरे से ख़ारिज कर दिया, इस पर वृंदा ने गणेश को एक नहीं बल्कि दो शादिया होने का श्राप दे डाला.

लेकिन तब गणेश ने भी उसके ऐसे श्राप पर वृंदा को श्राप दिया की उसकी शादी एक असुर से होगी, तब गणेश की शादी ऋद्धि सिद्दी से हुई और वृंदा की शादी जालंधर नाम के असुर से. जालंधर को मारने के लिए विष्णु ने जी जालंधर का रूप धरा और वृंदा का सतीत्व भंग किया.

तब वृन्दा अपने पति के साथ सती हो गई और उसकी चिता के स्थान पर तुलसी के पौधे उगे जिनसे विष्णु के पत्थर रूपी रूप शालिग्राम का विवाह किया जाता है. तब से वृंदा तुलसी हो गई और वृंदा और गणेश जी के बीच में वैर होने से तुलसी गणेश जी को अर्पित नही होती है ऐसा करने से लम्बोदर रुष्ट हो सकते है.

रुष्ट इसलिए क्योंकि वो तुलसी ही थी जिसने गणेश के ब्रह्मचर्य का व्रत टूटने के लिए श्राप दिया था, श्रीगणेश को दूर्वा यानि घास चढ़ाई जाती है जो की उन्हें एक बूटी के रूप दुर्वासा ने दी थी

=========================================================

Friday, February 19, 2016

3>||श्री गणेश चतुरथि --(1--5)

 3>|| श्री गणेश चतुरथि***( 1 to 5 )

1> -----------------------गणेश चतुरथि
2>------------------गणेश चतुंर्थी व्रत किस तरह करे?
3>------------------गणेशोत्सव
4>------------------गणेश जीके बिंभिन्न रूप
5>------------------श्री सिद्धिविनायक---अष्टविनायक स्तोत्र
========================================================================

                                       ॐ नमः गणेशाय नमः


        1>  गणेश चतुरथि
                  
भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, 
भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। यह मान्यता है कि
भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार
गणेश चतुर्थी का दिन अगस्त अथवा सितम्बर के महीने में आता है।
गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, १० दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है
और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही
धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी
इत्यादि में विसर्जन करते हैं।

गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त
ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय
को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। हिन्दू दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल,
अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है।

हिन्दू समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पाँच बराबर भागों में विभाजित
किया जाता है। इन पाँच भागों को क्रमशः प्रातःकाल, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना
जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, गणेश स्थापना और गणेश पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये। वैदिक
ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।
मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम
से जाना जाता है।

★गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन।
गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या
दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा
आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के, 
★नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान
कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।
नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो
व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज  में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।
================================
2>गणेश चतुंर्थी व्रत किस तरह करे?

✨ गणेश चतुर्थी का व्रत किस तरह करें?
गणेश चतुर्थी के दिन प्रातःकाल उठ कर दैनिक क्रियाओं को पूरा कर के, स्नान कर के शुद्ध वस्त्र धारण करें।
पूजा के स्थान पर पूर्व दिशा की ओर मुँह रख कर कुश के आसन पर बैठें। अपने सामने छोटी चौकी के आसन
पर सफेद वस्त्र बिछा कर उस पर एक थाली में कुंकुं से ‘शुभ लाभ’ लिखें या स्वस्तिक का चिह्न बनाएँ और उस
पर मूर्ति स्थापित करें। थाली में कुंकुं और केसर से रंगे अक्षत का ढेर करें और उस पर गणेशजी कॊ मूर्ति रख
कर उन की पूजा करें और शुद्ध घी का दीपक जलाएँ तथा दिन के दौरान उपवास करके रात में चंद्रमा का
दर्शन कर के श्री गणेशजी को लड्डू का भोग लगाएँ और नेत्र बंद करके पूरी श्रद्धाभाव से गणेशजी का व्रत पूरा करें।

✨ संकट चतुर्थी व्रत करने से-- आप के जीवन में आए हुए हरेक प्रकार के संकट दूर होते हैं और यदि किसी भी
प्रकार का दोषारोपण लगा हो तो दूर होता है। समाज में मान-प्रतिष्ठा मिलती है। आयुष्य और बल में वृद्धि होती है
और सर्वत्र आप की कीर्ति फैलती है।
जलस्नान कराने से-- जीवन से दुःख का नाश होता है और सुख का आगमन होता है। जीवन में विद्या, धन संतान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सफेद पुष्प अथवा जासुद-- अर्पण करने से कीर्ति मिलती है।
दुर्वा अर्पण करने से-- सौभाग्य की प्राप्ति होती है, आर्थिक उन्नति होती है और संतान का सुख मिलता है।
सिंदूर अर्पण करने से-- सौभाग्य की प्राप्ति होती है।धूप अर्पण करने से कीर्ति मिलती है।
लड्डू अर्पण करने से-- मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
===========================================
3> गणेशोत्सव

भारतीय संस्कृति अध्यात्मवादी है, तभी तो उसकाश्रोत कभी सूख नहीं पाता है। वह निरन्तर अलख जगाकर
विपरीत परिस्थितियों को भी आनन्द और उल्लास से जोड़करमानव-जीवन में नवचेतना का संचार करती रहती है।
त्यौहार,पर्व और उत्सव हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है,जिसमें जनमानस घोर विषम परिस्थितियों में
भी जीवन-यापनकरते हुए पर्वों के उल्लास, उमंग में रमकर खुशी का मार्ग तलाश लेते हैं। आज ये पर्व भारतीयता
की पहचान बन चुके हैं।मंगलकर्ता, विध्न विनाशक गणेश जी के जन्मोत्सव की धूमचारों ओर मची है।
कभी महाराष्ट्र में सातवाहन, चालुक्य,राष्ट्रकूट और पेशवा आदि राजाओं द्वारा चलाई गई गणेशोत्सव की प्रथा
आज महाराष्ट्र तक ही सीमित न होकर देश के कोने-कोने में ही नहीं अपितु कई दूसरे राष्ट्रों में भी मनाया जाने
वाला पर्व बन बैठा है। गणेशोत्सव की धूम सार्वजनिक स्थलों में विद्युत साज-सज्जा के साथ छोटी-बड़ी सजी-धजी
प्रतिमाओं के विराजमान होने से तो है ही साथ ही साथ घर-घरमें विभिन्न सुन्दर आकार-प्रकार की प्रतिमाओं के
विराजने से और भी बढ़ जाती है।
भगवान गणेश के कई अवतारों की कथाएं प्रचलित है, लेकिनमुख्य रूप से उनके 8 अवतार प्रसिद्ध हैं,
जिसमें क्रमशः

  1. पहलाअवतार ‘वक्रतुंड ‘ जिसमें उनके द्वारा ‘मत्सरासुर‘ के अत्याचारों से देवताओं को मुक्ति दिलाने, 
  2. दूसरे अवतार ‘एकदन्त ‘ जिसमें देवता और ऋषि-मुनियों को सताने वाले ‘मदासुर‘ को परास्तकरने, 
  3. तीसरे अवतार ‘महोदर ‘‘ जिसमें ‘मोहासुर‘ को अपनी अमोघशक्ति बल पर समर्पण करने को विवश करने, 
  4. चौथे अवतार ‘गजान न ‘ जिसमें अधर्म, अनीति और अत्याचार के पर्याय बने‘लोभासुर‘ के अभिमान को नष्ट करने, 
  5. पांचवे अवतार ‘लम्बोदर ‘जिसमें सूर्य देव से निरोगी और अमरता का वरदान पाने वाले‘क्रोधासुर‘ की क्रोधाग्नि को मिटाने, 
  6. छठवें अवतार ‘विकट‘ में शिव से वरदान प्राप्त छल-कपट, ईर्ष्या -द्वेष, पाप-झूठ के पर्याय बने कामासुर‘ को अपनी बुद्धिबल और नीतियुक्त वचनों से परास्त करने, 
  7. सातवें अवतार ‘विध्नराज‘ जिसमें ‘ममासुर‘ के अत्याचारों से देव और ऋषि-मुनियों को मुक्ति दिलाने, 
  8. आठवेअवतार ‘धूम्रवर्ण ‘ जिसमें अहंकार के पर्याय ‘अहंकारसुर‘ के अहंकार के मर्दन कर लोक में सुख-शांति की 
          स्थापना का उल्लेख मिलता है।
हमारी संस्कृति में प्राचीन कथा सुविख्यात है कि गणपतिसे प्रार्थना कर महर्षि वेदव्यास ने लोक कल्याणार्थ 60 लाख श्लोकों के रूप में महाभारत की रचना की, जिसमें कहा जाता है कि इनमें से 30 लाख देवलोक, 14 लाख असुर लोक, 15 लाख यक्ष लोक और केवल 1 लाख पृथ्वी लोक पर हैं। महाभारत को वेद भी माना जाता है। इन सभी कथाओं पर यदि थोड़ा बहुत गहन विचार किया जाय तो एक बात जो समरूप दृष्टिगोचर होतीहै- वह यह कि भगवान गणेण  जी ने समय-समय पर लोक जीवन में उपजी बुराईयों के पर्याय (प्रतीक) ‘असुर‘ की आसुरी शक्तियों का दमन कर  लोक कल्याणर्थ अवतार लेकर सुख-शांति कायम कर यही सन्देश बार-बार दिया कि कोई भी बुराई जब चरम सीमा पर हो तो, उस बुराई का खात्मा करने के प्रयोजनार्थ जरूर आगे बढ़कर उसे खत्म कर लोक में सुख-शांति, समृद्धि  कायम करना है। हर वर्ष लोक में व्याप्त ऐसी ही मोह, मद, लोभ, क्रोध, अहंकारादि आसुरी शक्तियों की समाप्ति  की मंशा लेकर लिए शायद हम गणपति की स्थापना कर उनसे ज्ञान, बुद्धि देते रहने और सुख-शांति बनाए रखने के उद्देश्यार्थ उत्साहपूर्वक पूजा-आराधना कर उनके कृपा कांक्षी बनना नहीं भूलते हैं। भगवान श्रीगणेश हमारे प्रेरणा के  श्रोत हैं- उनकी लम्बी सूंड हमें अपने चारों ओर की घटनाओं की जानकारी देने के साथ ही ज्यादा सीखने के लिए  प्रेरित करती है। उनके बड़े-बड़े कान हमें नए विचारों और सुझावों को ध्यान और धैर्यपूर्वक सुनने की सीख देते हैं।
उनका बड़ा मस्तक बड़ी और उपयोगी बातें सोचने के लिए प्रेरित करता है। उनकी छोटी-छोटी आँखे हमें अपने
कार्यों को सूक्ष्म और उचित ढंग से शीघ्र पूर्ण करने हेतु प्रेरित करते हैं औरउनका छोटा मुँह हमें इस बात का स्मरण कराता है कि हमें कम से कम बोलना चाहिए।
युगद्रष्टा लोकमान्य तिलक ने समाज को एकाकार करने के लिए गणेशोत्सव की जो परम्परा कायम की है,
आइये उसे कायम रखें और हर्ष उल्लास से मनाएं।
हर वर्ष फिर से गणपति जी विराजमान हों, इसलिए प्रेम व श्रद्धापूर्वक सब कहते हैं।
''गणपति बप्पा मोरिया, मंगल मुरती मोर्या"
==========================================================

4> गणेश जीके बिंभिन्न रूप

गणेश जी के विभिन्न रूपों की आराधना का महत्त्व...

              सफेद आंकड़े के गणेश
तंत्र क्रियाओं में सफेद आंकड़ा (एक प्रकार का पौधा) की जड़ से निर्मित श्रीगणेश का विशेष महत्व है। इसे
श्वेतार्क गणपति भी कहते हैं। कई टोने-टोटकों में श्रीगणेश के इस स्वरूप का उपयोग किया जाता है।
श्वेतार्क गणपति को घर में स्थापित कर विधि-विधान से पूजा करने पर घर में किसी ऊपरी बाधा का असर नहीं होता।
               मूंगा गणेश
मूंगा सिंदूरी रंग का एक रत्न होता है। इससे निर्मित श्रीगणेश की प्रतिमा को पूजा स्थान पर स्थापित करने व नित्य
पूजा करने से शत्रुओं का भय समाप्त हो जाता है साथ ही इससे बने श्रीगणेश अपने भक्तों की हर मनोकामना
पूरी करते हैं।

                 पन्ने के गणेश
पन्ना भी हरे रंग का एक रत्न होता है। इससे निर्मित श्रीगणेश की प्रतिमा की पूजा स्थान पर स्थापित कर
विधि-विधान से पूजा करने पर बुद्धि व यश प्राप्त होता है। विद्यार्थियों के लिए पन्ने के गणेशजी की पूजा करना
श्रेष्ठ होता है।
                   चांदी के गणेश
जो लोग धन की इच्छा रखते हैं, उन्हें चांदी से निर्मित गणेश प्रतिमा की पूजा करना चाहिए। इन्हें पूजा घर में
स्थापित कर दूर्वा चढ़ाने से धन-संपत्ति में वृद्धि होती है और धन की आगमन भी तेजी से होने लगता है। इनकी
पूजा करने से जीवन का सुख प्राप्त होता है।

               चंदन की लकड़ी के गणेश
चंदन की लकड़ी से निर्मित श्रीगणेश की प्रतिमा घर में कहीं भी स्थापित कर सकते हैं। इससे घर में किसी प्रकार
की विपदा नहीं आती साथ ही परिवार के सदस्यों में सामंजस्य बना रहता है व पारिवारिक माहौल खुशहाल रहता है।
                 पारद गणेश
धन-संपत्ति प्राप्ति के लिए पारद यानी पारे से निर्मित गणेश प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। यदि किसी ने आपके
घर पर या घर के किसी सदस्य पर तंत्र प्रयोग किया हो तो पारद गणेश की पूजा से उसका कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता।
                     बांसुरी बजाते गणेश
यदि आपके घर में रोज क्लेश या विवाद होता है तो आपको बांसुरी बजाते हुए श्रीगणेश की तस्वीर या मूर्ति घर में
स्थापित करना चाहिए। बांसुरी बजाते हुए श्रीगणेश की पूजा करने से घर में सुख-शांति का वातावरण रहता है।

                   हरे रंग के गणेश
हरे रंग के श्रीगणेश की पूजा करने से ज्ञान व बुद्धि की वृद्धि होती है। विद्यार्थियों को विशेषतौर पर हरे रंग की श्रीगणेश  की मूर्ति या तस्वीर का पूजन करना चाहिए।

                       हाथी पर बैठे गणेश
यदि आप धन की इच्छा रखते हैं तो आपको हाथी पर बैठे श्रीगणेश की पूजा करना चाहिए। हाथी पर विराजित
श्रीगणेश की पूजा करने से पैसा, इज्जत व शौहरत मिलती है।


                    नाचते हुए गणेश
नाचते हुए गणेश की पूजा करने से मन को शांति का अनुभव होता है। यदि आप किसी तनाव में हैं तो आपको
प्रतिदिन नाचते हुए श्रीगणेश की पूजा करना चाहिए।

                        पंचमुखी गणेश
तंत्र क्रिया की सिद्धि के लिए पंचमुखी श्रीगणेश का पूजन किया जाता है, इससे कोई भी तंत्र क्रिया किसी भी
बाधा के संपन्न हो जाती है
==============================================
5> श्री सिद्धिविनायक---अष्टविनायक स्तोत्र

ॐ गं गणपतये नमः॥श्री सिद्धिविनायक नमो नमः॥अष्टविनायक नमो नमः॥
गजाननं भूत गणादिसेवितम्।कपित्थ जम्बूफल चारु भक्षणम्॥
उमासुतं शोकविनाशकारकं।नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्॥
विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः।निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम्। लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम्॥
सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गज़कर्णकः।लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छ्रणुयादपि॥
विद्यारंम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।संग्रामें संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥
==================================================

2>|| श्री गणेश 108नाम-(1--5)

 2>श्री गणेश108 नाम***( 1 to 5 )
1>----------------जानिए भगवान गणेश जी के 108 नाम – संस्कृ
2>-----------------गणेश अष्टोत्तर शत नामा
3>-----------------श्रीगणेश के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का झूठा आरोप!=+mtl
4>-----------------भगवान गणेश थे बालब्रह्मचारी, फिर कैसे की दो शादिया?=+mtl
5>------------------कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक=+mtl
========================================================================

> SPIRITUAL=ধার্মিক বিষয়=(4 )

ॐ नम गणेशाय नमः
1>जानिए भगवान गणेश जी के 108 नाम – संस्कृति।

सनातन धर्म में भगवान को कई नामों से जाना जाता है। वस्तुत: यह नाम देवताओं और महान श्रषियों द्वारा भगवान की स्तुति करने पर प्रकट होते हैं। भगवान गणेश जी को भी कई नामों से जाना जाता है, पर सनातन धर्म से 108 नामों का अलग ही महत्व होता है।

पढ़िए उनमे से उनके मुख्य 108 नाम।

                                       भगवान गणेश नामावली
1. बालगणपति: सबसे प्रिय बालक- - - - - - - - - - - -2. भालचन्द्र: जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो
3. बुद्धिनाथ: बुद्धि के भगवान- - - - - - - - - - - - - -4. धूम्रवर्ण: धुंए को उड़ाने वाला
5. एकाक्षर: एकल अक्षर- - - - - - - - - - - - - - - - - 6. एकदन्त: एक दांत वाले
7. गजकर्ण: हाथी की तरह आंखें वाला- - - - - - - - - -8. गजानन: हाथी के मुँख वाले भगवान
9. गजनान: हाथी के मुख वाले भगवान- - - - - - - - - - 10. गजवक्र: हाथी की सूंड वाला
11. गजवक्त्र: जिसका हाथी की तरह मुँह है- - - - - - - - 12. गणाध्यक्ष: सभी जणों का मालिक
13. गणपति: सभी गणों के मालिक- - - - - - - - - - - - -14. गौरीसुत: माता गौरी का बेटा
15. लम्बकर्ण: बड़े कान वाले देव- - - - - - - - - - - - -16. लम्बोदर: बड़े पेट वाले
17. महाबल: अत्यधिक बलशाली वाले प्रभु- - - - - - - - - 18. महागणपति: देवातिदेव
19. महेश्वर: सारे ब्रह्मांड के भगवान- - - - - - - - - - - - -20. मंगलमूर्त्ति: सभी शुभ कार्य के देव
21. मूषकवाहन: जिसका सारथी मूषक है- - - - - - - - -- 22. निदीश्वरम: धन और निधि के दाता
23. प्रथमेश्वर: सब के बीच प्रथम आने वाला- - - - - - - - - 24. शूपकर्ण: बड़े कान वाले देव
25. शुभम: सभी शुभ कार्यों के प्रभु- - - - - - - - - - - - -26. सिद्धिदाता: इच्छाओं और अवसरों के स्वामी
27. सिद्दिविनायक: सफलता के स्वामी- - - - - - - - - - --28. सुरेश्वरम: देवों के देव
29. वक्रतुण्ड: घुमावदार सूंड- - - - - - - - - - - - - - -- 30. अखूरथ: जिसका सारथी मूषक है
31. अलम्पता: अनन्त देव- - - - - - - - - - - - - - - - -32. अमित: अतुलनीय प्रभु
33. अनन्तचिदरुपम: अनंत और व्यक्ति चेतना- - - - - - - -34. अवनीश: पूरे विश्व के प्रभु
35. अविघ्न: बाधाओं को हरने वाले- - - - - - - - - - - - - -36. भीम: विशाल
37. भूपति: धरती के मालिक- - - - - - - - - - - - - - - - 38. भुवनपति: देवों के देव
39. बुद्धिप्रिय: ज्ञान के दाता- - - - - - - - - - - - - - - - - - --40. बुद्धिविधाता: बुद्धि के मालिक
41. चतुर्भुज: चार भुजाओं वाले- - - - - - - - - - - - - - - -42. देवादेव: सभी भगवान में सर्वोपरी
43. देवांतकनाशकारी: बुराइयों और असुरों के विनाशक- - - -44. देवव्रत: सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले
45. देवेन्द्राशिक: सभी देवताओं की रक्षा करने वाले- - - - - - -46. धार्मिक: दान देने वाला
47. दूर्जा: अपराजित देव- - - - - - - - - - - - - - - - - - 48. द्वैमातुर: दो माताओं वाले
49. एकदंष्ट्र: एक दांत वाले- - - - - - - - - - - - - - - - - -50. ईशानपुत्र: भगवान शिव के बेटे
51. गदाधर: जिसका हथियार गदा है- - - - - - - - - - - - -52. गणाध्यक्षिण: सभी पिंडों के नेता
53. गुणिन: जो सभी गुणों क ज्ञानी- - - - - - - - - - - - - - -54. हरिद्र: स्वर्ण के रंग वाला
55. हेरम्ब: माँ का प्रिय पुत्र- - - - - - - - - - - - - - - - - - -56. कपिल: पीले भूरे रंग वाला
57. कवीश: कवियों के स्वामी- - - - - - - - - - - - - - - - -58. कीर्त्ति: यश के स्वामी
59. कृपाकर: कृपा करने वाले- - - - - - - - - - - - - - - - -60. कृष्णपिंगाश: पीली भूरी आंखवाले
61. क्षेमंकरी: माफी प्रदान करने वाला- - - - - - - - - - - - -62. क्षिप्रा: आराधना के योग्य
63. मनोमय: दिल जीतने वाले- - - - - - - - - - - - - - - - -64. मृत्युंजय: मौत को हरने वाले
65. मूढ़ाकरम: जिन्में खुशी का वास होता है- - - - - - - - - - 66. मुक्तिदायी: शाश्वत आनंद के दाता
67. नादप्रतिष्ठित: जिसे संगीत से प्यार हो-- - - - - -- - - - - - - 68. नमस्थेतु: सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
69. नन्दन: भगवान शिव का बेटा- - - - - - - - - - - - - - --70. सिद्धांथ: सफलता और उपलब्धियों की गुरु
71. पीताम्बर: पीले वस्त्र धारण करने वाला- - - - - - - - - - -72. प्रमोद: आनंद
73. पुरुष: अद्भुत व्यक्तित्व- - - - - - - - - - - - - - - - 74. रक्त: लाल रंग के शरीर वाला
75. रुद्रप्रिय: भगवान शिव के चहीते- - - - - - - - - - - - -76. सर्वदेवात्मन: सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता
77. सर्वसिद्धांत: कौशल और बुद्धि के दाता- - - - - - - - - - -78. सर्वात्मन: ब्रह्मांड की रक्षा करने वाला
79. ओमकार: ओम के आकार वाला- - - - - - - - - - - - 80. शशिवर्णम: जिसका रंग चंद्रमा को भाता हो
81. शुभगुणकानन: जो सभी गुण के गुरु हैं- - - - - - - - - -82. श्वेता: जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध है
83. सिद्धिप्रिय: इच्छापूर्ति वाले- - - - - - - - - - - - - - - 84. स्कन्दपूर्वज: भगवान कार्तिकेय के भाई
85. सुमुख: शुभ मुख वाले- - - - - - - - - - - - - - - 86. स्वरुप: सौंदर्य के प्रेमी
87. तरुण: जिसकी कोई आयु न हो- - - - - - - - - - - -88. उद्दण्ड: शरारती
89. उमापुत्र: पार्वती के बेटे- - - - - - - - - - - - - - -90. वरगणपति: अवसरों के स्वामी
91. वरप्रद: इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता- - - - - - - 92. वरदविनायक: सफलता के स्वामी
93. वीरगणपति: वीर प्रभु- - - - - - - - - - - - - - -94. विद्यावारिधि: बुद्धि की देव
95. विघ्नहर: बाधाओं को दूर करने वाले- - - - - - - - - -96. विघ्नहर्त्ता: बुद्धि की देव
97. विघ्नविनाशन: बाधाओं का अंत करने वाले- - - - - - - - -98. विघ्नराज: सभी बाधाओं के मालिक
99. विघ्नराजेन्द्र: सभी बाधाओं के भगवान- - - - - - - - -- 100. विघ्नविनाशाय: सभी बाधाओं का नाश करने वाला
101. विघ्नेश्वर: सभी बाधाओं के हरने वाले भगवान- - - - - -102. विकट: अत्यंत विशाल
103. विनायक: सब का भगवान- - - - - - - - - - - - - -104. विश्वमुख: ब्रह्मांड के गुरु
105. विश्वराजा: संसार के स्वामी- - - - - - - - - - --- - -105. यज्ञकाय: सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - --106. यशस्कर: प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी
107. यशस्विन: सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव- - - - - - -108. योगाधिप: ध्यान के प्रभु

========================================================
2>गणेश अष्टोत्तर शत नामा

ॐ गजाननाय नमः(1)
ॐ गणाध्यक्षाय नमः ॐ विघ्नाराजाय नम: ॐ विनायकाय नमः----------------------(4)
ॐ द्त्वेमातुराय नमः ॐ द्विमुखाय नमः ॐ प्रमुखाय नमः---------------------------(7)
ॐ सुमुखाय नमः ॐ कृतिने नमः ॐ सुप्रदीपाय नमः------------------------------- (10)
ॐ सुख निधये नमः ॐ सुराध्यक्षाय नमः ॐ सुरारिघ्नाय नमः------------------------(13)
ॐ महागणपतये नमः ॐ मान्याय नमः ॐ महा कालाय नमः-----------------------(16)
ॐ महा बलाय नमः ॐ हेरम्बाय नमः ॐ लम्ब जठराय नमः------------------------(19)
ॐ ह्रस्व ग्रीवाय नमः (20)ॐ महोदराय नमःॐ मदोत्कटाय नमः-------------------(22)
ॐ महावीराय नमः ॐ मन्त्रिणे नमः ॐ मङ्गल स्वराय नमः--------------------------(25)
ॐ प्रमधाय नमः ॐ प्रथमाय नमः ॐ प्राज्ञाय नमः------------------------------------(28)
ॐ विघ्नकर्त्रे नमः ॐ विघ्नहन्त्रे नमः (30) ॐ विश्व नेत्रे नमः---------------------------(31)
ॐ विराट्पतये नमः ॐ श्रीपतये नमः ॐ वाक्पतये नमः-----------------------------(34)
ॐ शृङ्गारिणे नमः ॐ अश्रित वत्सलाय नमःॐ शिवप्रियाय नमः---------------------(37)
ॐ शीघ्रकारिणे नमः ॐ शाश्वताय नमः ॐ बलाय नमः----------------------------- (40)
ॐ बलोत्थिताय नमः ॐ भवात्मजाय नमः ॐ पुराण पुरुषाय नमः-------------------(43)
ॐ पूष्णे नमः ॐ पुष्करोत्षिप्त वारिणे नमःॐ अग्रगण्याय नमः----------------------(46)
ॐ अग्रपूज्याय नमः ॐ अग्रगामिने नमः ॐ मन्त्रकृते नमः---------------------------(49)
ॐ चामीकर प्रभाय नमः (50)ॐ सर्वाय नमः ॐ सर्वोपास्याय नमः------------------(52)
ॐ सर्व कर्त्रे नमः ॐ सर्वनेत्रे नमः ॐ सर्वसिध्धि प्रदाय नमः--------------------------(55)
ॐ सर्व सिद्धये नमः ॐ पञ्चहस्ताय नमः ॐ पार्वतीनन्दनाय नमः--------------------(58)
ॐ प्रभवे नमः ॐ कुमार गुरवे नमः (60)ॐ अक्षोभ्याय नमः--------------------------(61)
ॐ कुञ्जरासुर भञ्जनाय नमःॐ प्रमोदाय नमः ॐ मोदकप्रियाय नमः-----------------(64)
ॐ कान्तिमते नमः ॐ धृतिमते नमः ॐ कामिने नमः---------------------------------(67)
ॐ कपित्थवन प्रियाय नमःॐ ब्रह्मचारिणे नमः ॐ ब्रह्मरूपिणे नमः------------------ (70)
ॐ ब्रह्मविद्यादि दानभुवे नमःॐ जिष्णवे नमः ॐ विष्णुप्रियाय नमः-------------------(73)
ॐ भक्त जीविताय नमःॐ जित मन्मथाय नमः ॐ ऐश्वर्य कारणाय नमः--------------(76)
ॐ ज्यायसे नमः ॐ यक्षकिन्नेर सेविताय नमःॐ गङ्गा सुताय नमः--------------------(79)
ॐ गणाधीशाय नमः (80)ॐ गम्भीर निनदाय नमःॐ वटवे नमः----------------------(82)
ॐ अभीष्ट वरदायिने नमःॐ ज्योतिषे नमः ॐ भक्त निथये नमः----------------------(85)
ॐ भाव गम्याय नमः ॐ मङ्गल प्रदाय नमः ॐ अव्वक्ताय नमः-----------------------(88)
ॐ अप्राकृत पराक्रमाय नमःॐ सत्य धर्मिणे नमः (90)ॐ सखये नमः----------------(91)
ॐ सरसाम्बु निथये नमः ॐ महेशाय नमः ॐ दिव्याङ्गाय नमः------------------------(94)
ॐ मणिकिङ्किणी मेखालाय नमःॐ समस्त देवता मूर्तये नमः--------------------------(96)
ॐ सहिष्णवे नमः ॐ सततोत्थिताय नमः ॐ विघात कारिणे नमः----------------------(99)
ॐ विश्वग्दृशे नमः (100)ॐ विश्वरक्षाकृते नमः ॐ कल्याण गुरवे नमः------------------(102)
ॐ उन्मत्त वेषाय नमः ॐ अपराजिते नमः ॐ समस्त जगदाधाराय नमः---------------(105)
ॐ सर्त्वेश्वर्य प्रदाय नमः ॐ आक्रान्त चिद चित्प्रभवे नमः--------------------------------(107)
ॐ श्री विघ्नेश्वराय नमः-------------------------------------------------------------------- (108)
===========================xxxxxxx===================
3>श्रीगणेश के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का झूठा आरोप!

भगवान गणेश का जन्म दिवस गणेश चतुर्थी के से जुडी है ये अद्भुद पौराणिक कथा, भागद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था, इस दिन को विशेष तौर पे महाराष्ट्र में बड़े धूम धाम से मनाया जाता हैं और ये उतसव पुरे दस दिनों तक चलता है( लोकमान्य तिलक ने शुरू करवाया था.).

गणेश चतुर्थी के दिन गणेश को चन्द्रलोक में भोज का निमंत्रण था, गणेश को मोदक प्रिय है और मोदक ही भोजन में था ऐसे में टूट पड़े और इतना ही नही बच्चे खुले लड्डू भी अपने साथ समेट के ले गए. एक दम दबाके लड्डू खाए गणेश को नींद भी आने लगी और निकलते समय ही वो गिर पड़े और पुरे लड्डू बिखर गए, लेकिन ये दिख चन्द्रदेव अपनी हंसी न रोक पाये और जोर जोर से हंस पड़े.

इस पर गणेश क्रोधित हो गए और उन्हें श्राप दे डाला की मुझपे हंसने वाले जो तुझे देखेगा उसपे चोरी का झूठा नाम लग जायेगा और वो बदनाम होगा, अपनी प्रतिष्ठा पर बात आते देख चन्द्रदेव घबरा के गणेश के चरणो में गिर गए और क्षमा याचना करने लगे. कुछ देर बाद गणेश का गुस्सा शांत हुआ लेकिन उन्होंने श्राप को चतुर्थी के दिन जारी रखा, तब से चतुर्थी के दिन चाँद को नही देखा जाता है अगर देख ले तो अनिष्ट हो जाता है.

कृष्ण पर चोरी का झूठा आरोप: द्वापर युग में एक राजा था नाम था, जिनका नाम था सत्राजित उन्होंने सूर्य को प्रसन्न कर स्यमन्तक मणि वरदान में पाली थी. वो मणि रोज आठ भरी सोना देती थी और जन्हा वो रहती थी( जिसके पास) वंहा कोई समस्या नही होती थी.

एक दिन जब कृष्ण खेल रहे थे तो सत्राजित मणि सर पर लगा उनसे मिलने पहुंचे जिसे देख कृष्ण ने कहा की इस मणि के अधिकारी तो राजा उग्रसेन जी है। बात सुन सत्राजित बिना कुछ बोले ही वहाँ से उठ कर चले गए, मणि को अपने घर के मन्दिर में स्थापित कर दिया।

गणेश चतुर्थी का दिन था और कृष्ण अपने महल में खड़े थे और उनकी नजर चन्द्र पे पड़ गई, तब रुक्मणी जी को बड़ी चिंता हुई की मेरे पति किस मुसीबत में पड़ने वाले है. उसी दिन राजा का भाई स्यमन्तक को पहन कर घोड़े पर सवार हो शिकार पे निकला जन्हा एक सिंह ने उसे मार गिराया। मणि भी उसके पेट में चली गई जिसे ऋक्षराज जामवंत ने मारा और वह मणि पाली और अपनी गुफा में चला गया। जामवंत ने उस मणि को अपने बालक को दे दिया जो उसे खिलौना समझ उससे खेलने लगा।

भाई के गायब होने पर राजा ने बिना सोचे कृष्ण जी पर हत्या और चोरी के आरोप फैला दिए। आरोप झुटलाने के लिए श्री कृष्ण वन में गए जन्हा उन्होंने घोड़ा सहित प्रसेनजित को मरा हुआ देखा पर मणि नहीं दिखी। निकट ही सिंह के पंजों के चिन्ह थे, जिनके सहारे आगे बढ़ने पर उन्हें मरे हुए सिंह का शरीर मिला। वहाँ पर रीछ के पैरों के पद-चिन्ह भी मिले जो कि एक गुफा तक गये थे।

तब जामवंत से अठाईस दिन तक युद्ध कर उन्होंने पूर्व राम जन्म का वादा जामवंत से पूरा किया और मणि वापस देकर अपना कलंक हटाया. जामवंत ने अपनी पुत्री जामवंत का हाथ भगवान के हाथ में दिया और शर्मवश राजा सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवहा कृष्ण से कर अपने पाप का प्रायश्चित किया.

जब गणेश को ये पता चला तो उन्होंने गणेश चतुर्थी के दिन को भी चन्द्र को श्राप मुक्त कर दिया, इस कारन गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र को देखने से दोष नही लगता है. गणपति बाप्पा मोरेया.
============================================
4>.==भगवान गणेश थे बालब्रह्मचारी, फिर कैसे की दो शादिया?

भगवान गणेश बालब्रह्मचारी थे लेकिन बाद में ऐसा क्या हो गया की उन्होंने एक नही दो दो शादिया की? इसके लिए पौराणो के गर्भ में जाना होगा आपको लेकिन हम है न. सति तुलसी का नाम तो अपने सुना ही होगा जो की जालंधर से ब्याही गई और बाद में भगवान विष्णु के छलावे के चलते उन्हें श्राप दे पत्थर का बना दिया.

इन्ही सति की जब असुरराज जालंधर से शादी नही हुई थी तो उन्होंने एक बार गणेश को देख उन्हें अपने पति रूप में पानी की इच्छा इन्ही बालब्रह्मचारी गणेश से कर दी. बस फिर क्या था भड़क गए गणेश और कर दिया इंकार, इस पर तुलसी ने गणेश को श्राप दिया की जिस ब्रह्मचर्य पे तुम अकड़ रहे हो वो नही रहेगा और तुम्हारी दो दो शादिया होगी, तब गणेश ने भी श्राप दिया की तुम्हारी एक असुर से शादी होगी.

फिर भी शादी तो अपने से नही होती है, तो सुनिए एक बाद दक्षराज अपनी दो बेटियो की शादी को लेकर चिंतित थे तो नारद ने उन्हें शिव पारवती से अपनी चिंता जताने को कहा. चूँकि नारद सब जानते थे की शिव पारवती के तो पुत्र है, ऐसे में दक्षराज अपनी दोनों बेटियो को बहु रूप में स्वीकार करने की विनती महादेव और सति से करने लगा.

लेकिन दोनों बेटियो की एक शर्त भी थी की वो शादी एक ही पुरुष से करेगी, ऐसे में महादेव और पारवती संशय में थे. दोनों ने एक तरीका निकला दोनों पुत्रो को शादी के बारे में बिना बताये ही दोनों में एक प्रतिस्पर्धा रखी जिसका इनाम शादी थी, प्रतियोगिता ये थी को जो भाई पुरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा सात बार सबसे पहले कर के आएगा वही जीतेगा.

कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मोर को तुरंत निकल लिए लेकिन मूषक की सवारी करने वाले गणेश वंही रुके, चूँकि उनका वाहन काफी धीमा था तो उन्होंने बुद्धि का इस्तेमाल किया.

माता पिता को एक चौक्की पे बैठाया और उनके सात परिक्रमा कर जीत का दावा किया. उनका तर्क था की माता पिता की तुलना शास्त्रो में ब्रह्माण्ड से की है तो मैं जीत गया, गणेश की बुद्धिमता देख माता पिता प्रसन्न हुए पर जब कार्तिकेय आया तो इसे छल समझ वंहा से नाराज हो चले गए

तब गणेश को इनाम में शादी मिली जो उनके न चाहने पर भी उन्हें माता पिता की आज्ञा और जीत के तोहफे के रूप में स्वीकार करनी पड़ी सति तुलसी का श्राप भी पूरा हुआ और दक्षराज की समस्या भी. दोनों पत्नियों का नाम ऋद्धि और सिद्धि था, और उनसे शुभ और लाभ नाम के दो पुत्र भी हुए गणेश के, जो आज भी व्यापारियों के लिए प्रथम पूजनीय है.
                                         गणपति बाप्पा मोरया.
==============================================

5>कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक

कहते है की इंसान का वर्तमान, उसके पिछले कर्मो पर और भविष्य वर्तमान कर्मों पर आधारित होता है। लेकिन यह बात केवल इंसानो पर ही नहीं अपितु भगवानों पर भी लागू होती है। हमारे पुराणों में अनेक ऐसी कथाएँ है जब भगवान द्वारा अतीत में किये गए अनुचित कार्यों के कारण उन्हें आने वाले समय में कष्ट उठाने पड़े। ऐसी ही एक कहानी भगवान शंकर से सम्बंधित है जब उन्हें कश्यप ऋषि द्वारा दिए गए शाप के कारण अपने ही पुत्र गणेश का मस्तक काटना पड़ा।

भगवान गणेश का जन्म की कहानी :

देवी पार्वती ने एक बार शिवजी के गण नन्दी के द्वारा उनकी आज्ञा पालन में त्रुटि के कारण अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना और किसी की नहीं। देवी पार्वती ने यह भी कहा कि मैं स्नान के लिए जा रही हूं। कोई भी अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शंकर आए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे।

यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया। बालक का हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। देवी पार्वती ने जब यह देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गई। उनकी क्रोध की अग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा।

तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया। तब भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।

कश्यप ऋषि ने दिया था शिव जी को शाप :

ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार नारद जी ने श्री नारायण से पूछा कि प्रभु आप बहुत विद्वान है और सभी वेदों को जानने वाले हैं। मैं आप से ये जानना चाहता हूं कि जो भगवान शंकर सभी परेशानियों को दूर करने वाले माने जाते हैं। उन्होंने क्यों अपने पुत्र गणेश की के मस्तक को काट दिया।

यह सुनकर श्रीनारायण ने कहा नारद एक समय की बात है। शंकर ने माली और सुुमाली को मारने वाले सूर्य पर बड़े क्रोध में त्रिशूल से प्रहार किया। सूर्य भी शिव के समान तेजस्वी और शक्तिशाली था। इसलिए त्रिशूल की चोट से सूर्य की चेतना नष्ट हो गई। वह तुरंत रथ से नीचे गिर पड़ा। जब कश्यपजी ने देखा कि मेरा पुत्र मरने की अवस्था में हैं। तब वे उसे छाती से लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओं में हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोर से रुदन करने लगे। अंधकार छा जाने से सारे जगत में अंधेरा हो गया। तब ब्रह्मा के पौत्र तपस्वी कश्यप जी ने शिव जी को शाप दिया वे बोले जैसा आज तुम्हारे प्रहार के कारण मेरे पुत्र का हाल हो रहा है। ठीक वैसे ही तुम्हारे पुत्र पर भी होगा। तुम्हारे पुत्र का मस्तक कट जाएगा।

यह सुनकर भोलेनाथ का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने सूर्य को फिर से जीवित कर दिया। सूर्य कश्यप जी के सामने खड़े हो गए। जब उन्हें कश्यप जी के शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी का त्याग करने का निर्णय लिया। यह सुनकर देवताओं की प्रेरणा से भगवान ब्रह्मा सूर्य के पास पहुंचे और उन्हें उनके काम पर नियुक्त किया।

ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनंद से सूर्य को आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवन चले गए। इधर सूर्य भी अपनी राशि पर आरूढ़ हुए। इसके बाद माली और सुमाली को सफेद कोढ़ हो गया, जिससे उनका प्रभाव नष्ट हो गया। तब स्वयं ब्रह्मा ने उन दोनों से कहा-सूर्य के कोप से तुम दोनों का तेज खत्म हो गया है। तुम्हारा शरीर खराब हो गया है। तुम सूर्य की आराधना करो। उन दोनों ने सूर्य की आराधना शुरू की और फिर से निरोगी हो गए।
=============================================

1>सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्रम्,+विघ्नविनायक पाद नमस्ते+गणेश जी के आठ अति प्राचीन मंदिर

 1>|| *सङ्कष्टनाशन स्तोत्रम्***( 1 to 3 )
1>-------------- श्री सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्रम्
2>-------------- विघ्नविनायक पाद नमस्ते
3>---------------अष्टविनायक – गणेश जी के आठ अति प्राचीन मंदिर, जहाँ है स्वयंभू गणेश जी
*********************************************************************************
ॐ नम गणेशाय नमः
1> श्री सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्रम्,

श्री गणेशाय नमः श्री सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्रम्,,नारद उवाच।
प्रणम्य शिरसा देवं गौरी पुत्रं विनायाकम्। भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुष्कामार्थसिद्धये॥१॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतर्थकम्॥२॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च। सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥३॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥४॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः। न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्॥५॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥६॥
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥७॥
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥ ८॥

इति श्रीनारदपुराणे सङ्कष्टनाशनं नाम गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥
=================
2> विघ्नविनायक पाद नमस्ते

ॐ श्री गणेशाय नमः. वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजंबूफलचारुभक्षणम्‌ ।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्‌
सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः ।लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ।
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।
विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
मूषिकवाहन् मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बित सूत्र ।
वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते
====================
3>अष्टविनायक – गणेश जी के आठ अति प्राचीन मंदिर, जहाँ है स्वयंभू गणेश जी



अष्टविनायक से अभिप्राय है- “आठ गणपति”। यह आठ अति प्राचीन मंदिर भगवान गणेश के आठ शक्तिपीठ भी कहलाते है जो की महाराष्ट्र में स्तिथ हैं।महाराष्ट्र में पुणे के समीप अष्टविनायक के आठ पवित्र मंदिर 20 से 110 किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित हैं। इन मंदिरों का पौराणिक महत्व और इतिहास है। इनमें विराजित गणेश की प्रतिमाएँ स्वयंभू मानी जाती हैं, यानि यह स्वयं प्रगट हुई हैं। यह मानव निर्मित न होकर प्राकृतिक हैं। ‘अष्टविनायक’ के ये सभी आठ मंदिर अत्यंत पुराने और प्राचीन हैं। इन सभी का विशेष उल्लेख गणेश और मुद्गल पुराण, जो हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथों का समूह हैं, में किया गया है। इन आठ गणपति धामों की यात्रा अष्टविनायक तीर्थ यात्रा के नाम से जानी जाती है। इन पवित्र प्रतिमाओं के प्राप्त होने के क्रम के अनुसार ही अष्टविनायक की यात्रा भी की जाती है। अष्टविनायक दर्शन की शास्त्रोक्त क्रमबद्धता इस प्रकार है-
मयूरेश्वर या मोरेश्वर – मोरगाँव, पुणे
सिद्धिविनायक – करजत तहसील, अहमदनगर
बल्लालेश्वर – पाली गाँव, रायगढ़
वरदविनायक – कोल्हापुर, रायगढ़
चिंतामणी – थेऊर गाँव, पुणे
गिरिजात्मज अष्टविनायक – लेण्याद्री गाँव, पुणे
विघ्नेश्वर अष्टविनायक – ओझर
महागणपति – राजणगाँव

1- श्री मयूरेश्वर मंदिर ( Moreshwar Temple) :
यह मंदिर पुणे से 80 किलोमीटर दूर स्थित है। मोरेगांव गणेशजी की पूजा का महत्वपूर्ण केंद्र है। मयूरेश्वर मंदिर के चारों कोनों में मीनारें हैं और लंबे पत्थरों की दीवारें हैं। यहां चार द्वार हैं। ये चारों दरवाजे चारों युग, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग के प्रतीक हैं।
इस मंदिर के द्वार पर शिवजी के वाहन नंदी बैल की मूर्ति स्थापित है, इसका मुंह भगवान गणेश की मूर्ति की ओर है। नंदी की मूर्ति के संबंध में यहां प्रचलित मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में शिवजी और नंदी इस मंदिर क्षेत्र में विश्राम के लिए रुके थे, लेकिन बाद में नंदी ने यहां से जाने के लिए मना कर दिया। तभी से नंदी यहीं स्थित है। नंदी और मूषक, दोनों ही मंदिर के रक्षक के रूप में तैनात हैं। मंदिर में गणेशजी बैठी मुद्रा में विराजमान है तथा उनकी सूंड बाएं हाथ की ओर है तथा उनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं।
मान्यताओं के अनुसार मयूरेश्वर के मंदिर में भगवान गणेश द्वारा सिंधुरासुर नामक एक राक्षस का वध किया गया था। गणेशजी ने मोर पर सवार होकर सिंधुरासुर से युद्ध किया था। इसी कारण यहां स्थित गणेशजी को मयूरेश्वर कहा जाता है।

2- सिद्धिविनायक मंदिर (Siddhivinayak Temple) :
अष्ट विनायक में दूसरे गणेश हैं सिद्धिविनायक। यह मंदिर पुणे से करीब 200 किमी दूरी पर स्थित है। समीप ही भीम नदी है। यह क्षेत्र सिद्धटेक गावं के अंतर्गत आता है। यह पुणे के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। मंदिर करीब 200 साल पुराना है। सिद्धटेक में सिद्धिविनायक मंदिर बहुत ही सिद्ध स्थान है। ऐसा माना जाता है यहां भगवान विष्णु ने सिद्धियां हासिल की थी। सिद्धिविनायक मंदिर एक पहाड़ की चोटी पर बना हुआ है। जिसका मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है। मंदिर की परिक्रमा के लिए पहाड़ी की यात्रा करनी होती है। यहां गणेशजी की मूर्ति 3 फीट ऊंची और ढाई फीट चैड़ी है। मूर्ति का मुख उत्तर दिशा की ओर है। भगवान गणेश की सूंड सीधे हाथ की ओर है।

3- श्री बल्लालेश्वर मंदिर (Ballaleshwar Temple) :
अष्टविनायक में अगला मंदिर है श्री बल्लालेश्वर मंदिर। यह मंदिर मुंबई-पुणे हाइवे पर पाली से टोयन में और गोवा राजमार्ग पर नागोथाने से पहले 11 किलोमीटर दूर स्थित है। इस मंदिर का नाम गणेशजी के भक्त बल्लाल के नाम पर पड़ा है। प्राचीन काल में बल्लाल नाम का एक लड़का था, वह गणेशजी का परमभक्त था। एक दिन उसने पाली गांव में विशेष पूजा का आयोजन किया। पूजन कई दिनों तक चल रहा था, पूजा में शामिल कई बच्चे घर लौटकर नहीं गए और वहीं बैठे रहे। इस कारण उन बच्चों के माता-पिता ने बल्लाल को पीटा और गणेशजी की प्रतिमा के साथ उसे भी जंगल में फेंक दिया। गंभीर हालत में बल्लाल गणेशजी के मंत्रों का जप कर रहा था। इस भक्ति से प्रसन्न होकर गणेशजी ने उसे दर्शन दिए। तब बल्लाल ने गणेशजी से आग्रह किया अब वे इसी स्थान पर निवास करें। गणपति ने आग्रह मान लिया।

4- श्री वरदविनायक (Varadavinayak Temple) :
अष्ट विनायक में चौथे गणेश हैं श्री वरदविनायक। यह मंदिर महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कोल्हापुर क्षेत्र में स्थित है। यहां एक सुन्दर पर्वतीय गांव है महाड़। इसी गांव में श्री वरदविनायक मंदिर। यहां प्रचलित मान्यता के अनुसार वरदविनायक भक्तों की सभी कामनों को पूरा होने का वरदान प्रदान करते हैं।
इस मंदिर में नंददीप नाम का एक दीपक है जो कई वर्षों में प्रज्जवलित है। वरदविनायक का नाम लेने मात्र से ही सारी कामनाओं को पूरा होने का वरदान प्राप्त होता है।

5- चिंतामणि गणपति (Chintamani Temple) :
अष्टविनायक में पांचवें गणेश हैं चिंतामणि गणपति। यह मंदिर पुणे जिले के हवेली क्षेत्र में स्थित है। मंदिर के पास ही तीन नदियों का संगम है। ये तीन नदियां हैं भीम, मुला और मुथा। यदि किसी भक्त का मन बहुत विचलित है और जीवन में दुख ही दुख प्राप्त हो रहे हैं तो इस मंदिर में आने पर ये सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि स्वयं भगवान ब्रहमा ने अपने विचलित मन को वश में करने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी।

6- श्री गिरजात्मज गणपति (Girijatmaj Temple) :
अष्टविनायक में अगले गणपति हैं श्री गिरजात्मज। यह मंदिर पुणे-नासिक राजमार्ग पर पुणे से करीब 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। क्षेत्र के नारायणगांव से इस मंदिर की दूरी 12 किलोमीटर है। गिरजात्मज का अर्थ है गिरिजा यानी माता पार्वती के पुत्र गणेश।
यह मंदिर एक पहाड़ पर बौद्ध गुफाओं के स्थान पर बनाया गया है। यहां लेनयादरी पहाड़ पर 18 बौद्ध गुफाएं हैं और इनमें से 8वीं गुफा में गिरजात्मज विनायक मंदिर है। इन गुफाओं को गणेश गुफा भी कहा जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 300 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। यह पूरा मंदिर ही एक बड़े पत्थर को काटकर बनाया गया है।

7- विघ्नेश्वर गणपति मंदिर (Vighnahar Temple) :
अष्टविनायक में सातवें गणेश हैं विघ्नेश्वर गणपति। यह मंदिर पुणे के ओझर जिले में जूनर क्षेत्र में स्थित है। यह पुणे-नासिक रोड पर नारायणगावं से जूनर या ओजर होकर करीब 85 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
प्रचलित कथा के अनुसार विघनासुर नामक एक असुर था जो संतों को प्रताणित कर रहा था। भगवान गणेश ने इसी क्षेत्र में उस असुर का वध किया और सभी को कष्टों से मुक्ति दिलवाई। तभी से यह मंदिर विघ्नेश्वर, विघ्नहर्ता और विघ्नहार के रूप में जाना जाता है।

8- महागणपति मंदिर (Mahaganapati Temple) :
अष्टविनायक मंदिर के आठवें गणेशजी हैं महागणपति। मंदिर पुणे के रांजणगांव में स्थित है। यह पुणे-अहमदनगर राजमार्ग पर 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । इस मंदिर का इतिहास 9-10वीं सदी के बीच माना जाता है। मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर है जो कि बहुत विशाल और सुन्दर है। भगवान गणपति की मूर्ति को माहोतक नाम से भी जाना जाता है। यहां की गणेशजी प्रतिमा अद्भुत है। प्रचलित मान्यता के अनुसार मंदिर की मूल मूर्ति तहखाने की छिपी हुई है। पुराने समय में जब विदेशियों ने यहां आक्रमण किया था तो उनसे मूर्ति बचाने के लिए उसे तहखाने में छिपा दिया गया था।
======================================================