3>|| श्री गणेश चतुरथि***( 1 to 5 )
ॐ नमः गणेशाय नमः
1> गणेश चतुरथि
भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन,
भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। यह मान्यता है कि
भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार
गणेश चतुर्थी का दिन अगस्त अथवा सितम्बर के महीने में आता है।
गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, १० दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है
और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही
धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी
इत्यादि में विसर्जन करते हैं।
गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त
ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय
को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। हिन्दू दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल,
अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है।
हिन्दू समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पाँच बराबर भागों में विभाजित
किया जाता है। इन पाँच भागों को क्रमशः प्रातःकाल, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना
जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, गणेश स्थापना और गणेश पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये। वैदिक
ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।
मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम
से जाना जाता है।
★गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन।
गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या
दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा
आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के,
1> -----------------------गणेश चतुरथि
2>------------------गणेश चतुंर्थी व्रत किस तरह करे?
3>------------------गणेशोत्सव
4>------------------गणेश जीके बिंभिन्न रूप
5>------------------श्री सिद्धिविनायक---अष्टविनायक स्तोत्र
2>------------------गणेश चतुंर्थी व्रत किस तरह करे?
3>------------------गणेशोत्सव
4>------------------गणेश जीके बिंभिन्न रूप
5>------------------श्री सिद्धिविनायक---अष्टविनायक स्तोत्र
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ॐ नमः गणेशाय नमः
1> गणेश चतुरथि
भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन,
भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार
गणेश चतुर्थी का दिन अगस्त अथवा सितम्बर के महीने में आता है।
गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, १० दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है
और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही
धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी
इत्यादि में विसर्जन करते हैं।
गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त
ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय
को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। हिन्दू दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल,
अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है।
हिन्दू समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पाँच बराबर भागों में विभाजित
किया जाता है। इन पाँच भागों को क्रमशः प्रातःकाल, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना
जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, गणेश स्थापना और गणेश पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये। वैदिक
ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।
मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम
से जाना जाता है।
★गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन।
गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या
दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा
आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के,
★नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान
कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।
नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो
व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।
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2>गणेश चतुंर्थी व्रत किस तरह करे?
✨ गणेश चतुर्थी का व्रत किस तरह करें?
गणेश चतुर्थी के दिन प्रातःकाल उठ कर दैनिक क्रियाओं को पूरा कर के, स्नान कर के शुद्ध वस्त्र धारण करें।
पूजा के स्थान पर पूर्व दिशा की ओर मुँह रख कर कुश के आसन पर बैठें। अपने सामने छोटी चौकी के आसन
पर सफेद वस्त्र बिछा कर उस पर एक थाली में कुंकुं से ‘शुभ लाभ’ लिखें या स्वस्तिक का चिह्न बनाएँ और उस
पर मूर्ति स्थापित करें। थाली में कुंकुं और केसर से रंगे अक्षत का ढेर करें और उस पर गणेशजी कॊ मूर्ति रख
कर उन की पूजा करें और शुद्ध घी का दीपक जलाएँ तथा दिन के दौरान उपवास करके रात में चंद्रमा का
दर्शन कर के श्री गणेशजी को लड्डू का भोग लगाएँ और नेत्र बंद करके पूरी श्रद्धाभाव से गणेशजी का व्रत पूरा करें।
✨ संकट चतुर्थी व्रत करने से-- आप के जीवन में आए हुए हरेक प्रकार के संकट दूर होते हैं और यदि किसी भी
प्रकार का दोषारोपण लगा हो तो दूर होता है। समाज में मान-प्रतिष्ठा मिलती है। आयुष्य और बल में वृद्धि होती है
और सर्वत्र आप की कीर्ति फैलती है।
कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।
नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो
व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।
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2>गणेश चतुंर्थी व्रत किस तरह करे?
✨ गणेश चतुर्थी का व्रत किस तरह करें?
गणेश चतुर्थी के दिन प्रातःकाल उठ कर दैनिक क्रियाओं को पूरा कर के, स्नान कर के शुद्ध वस्त्र धारण करें।
पूजा के स्थान पर पूर्व दिशा की ओर मुँह रख कर कुश के आसन पर बैठें। अपने सामने छोटी चौकी के आसन
पर सफेद वस्त्र बिछा कर उस पर एक थाली में कुंकुं से ‘शुभ लाभ’ लिखें या स्वस्तिक का चिह्न बनाएँ और उस
पर मूर्ति स्थापित करें। थाली में कुंकुं और केसर से रंगे अक्षत का ढेर करें और उस पर गणेशजी कॊ मूर्ति रख
कर उन की पूजा करें और शुद्ध घी का दीपक जलाएँ तथा दिन के दौरान उपवास करके रात में चंद्रमा का
दर्शन कर के श्री गणेशजी को लड्डू का भोग लगाएँ और नेत्र बंद करके पूरी श्रद्धाभाव से गणेशजी का व्रत पूरा करें।
✨ संकट चतुर्थी व्रत करने से-- आप के जीवन में आए हुए हरेक प्रकार के संकट दूर होते हैं और यदि किसी भी
प्रकार का दोषारोपण लगा हो तो दूर होता है। समाज में मान-प्रतिष्ठा मिलती है। आयुष्य और बल में वृद्धि होती है
और सर्वत्र आप की कीर्ति फैलती है।
जलस्नान कराने से-- जीवन से दुःख का नाश होता है और सुख का आगमन होता है। जीवन में विद्या, धन संतान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सफेद पुष्प अथवा जासुद-- अर्पण करने से कीर्ति मिलती है।
दुर्वा अर्पण करने से-- सौभाग्य की प्राप्ति होती है, आर्थिक उन्नति होती है और संतान का सुख मिलता है।
दुर्वा अर्पण करने से-- सौभाग्य की प्राप्ति होती है, आर्थिक उन्नति होती है और संतान का सुख मिलता है।
सिंदूर अर्पण करने से-- सौभाग्य की प्राप्ति होती है।धूप अर्पण करने से कीर्ति मिलती है।
लड्डू अर्पण करने से-- मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
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3> गणेशोत्सव
भारतीय संस्कृति अध्यात्मवादी है, तभी तो उसकाश्रोत कभी सूख नहीं पाता है। वह निरन्तर अलख जगाकर
विपरीत परिस्थितियों को भी आनन्द और उल्लास से जोड़करमानव-जीवन में नवचेतना का संचार करती रहती है।
त्यौहार,पर्व और उत्सव हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है,जिसमें जनमानस घोर विषम परिस्थितियों में
भी जीवन-यापनकरते हुए पर्वों के उल्लास, उमंग में रमकर खुशी का मार्ग तलाश लेते हैं। आज ये पर्व भारतीयता
की पहचान बन चुके हैं।मंगलकर्ता, विध्न विनाशक गणेश जी के जन्मोत्सव की धूमचारों ओर मची है।
कभी महाराष्ट्र में सातवाहन, चालुक्य,राष्ट्रकूट और पेशवा आदि राजाओं द्वारा चलाई गई गणेशोत्सव की प्रथा
आज महाराष्ट्र तक ही सीमित न होकर देश के कोने-कोने में ही नहीं अपितु कई दूसरे राष्ट्रों में भी मनाया जाने
वाला पर्व बन बैठा है। गणेशोत्सव की धूम सार्वजनिक स्थलों में विद्युत साज-सज्जा के साथ छोटी-बड़ी सजी-धजी
प्रतिमाओं के विराजमान होने से तो है ही साथ ही साथ घर-घरमें विभिन्न सुन्दर आकार-प्रकार की प्रतिमाओं के
विराजने से और भी बढ़ जाती है।
भगवान गणेश के कई अवतारों की कथाएं प्रचलित है, लेकिनमुख्य रूप से उनके 8 अवतार प्रसिद्ध हैं,
जिसमें क्रमशः
हमारी संस्कृति में प्राचीन कथा सुविख्यात है कि गणपतिसे प्रार्थना कर महर्षि वेदव्यास ने लोक कल्याणार्थ 60 लाख श्लोकों के रूप में महाभारत की रचना की, जिसमें कहा जाता है कि इनमें से 30 लाख देवलोक, 14 लाख असुर लोक, 15 लाख यक्ष लोक और केवल 1 लाख पृथ्वी लोक पर हैं। महाभारत को वेद भी माना जाता है। इन सभी कथाओं पर यदि थोड़ा बहुत गहन विचार किया जाय तो एक बात जो समरूप दृष्टिगोचर होतीहै- वह यह कि भगवान गणेण जी ने समय-समय पर लोक जीवन में उपजी बुराईयों के पर्याय (प्रतीक) ‘असुर‘ की आसुरी शक्तियों का दमन कर लोक कल्याणर्थ अवतार लेकर सुख-शांति कायम कर यही सन्देश बार-बार दिया कि कोई भी बुराई जब चरम सीमा पर हो तो, उस बुराई का खात्मा करने के प्रयोजनार्थ जरूर आगे बढ़कर उसे खत्म कर लोक में सुख-शांति, समृद्धि कायम करना है। हर वर्ष लोक में व्याप्त ऐसी ही मोह, मद, लोभ, क्रोध, अहंकारादि आसुरी शक्तियों की समाप्ति की मंशा लेकर लिए शायद हम गणपति की स्थापना कर उनसे ज्ञान, बुद्धि देते रहने और सुख-शांति बनाए रखने के उद्देश्यार्थ उत्साहपूर्वक पूजा-आराधना कर उनके कृपा कांक्षी बनना नहीं भूलते हैं। भगवान श्रीगणेश हमारे प्रेरणा के श्रोत हैं- उनकी लम्बी सूंड हमें अपने चारों ओर की घटनाओं की जानकारी देने के साथ ही ज्यादा सीखने के लिए प्रेरित करती है। उनके बड़े-बड़े कान हमें नए विचारों और सुझावों को ध्यान और धैर्यपूर्वक सुनने की सीख देते हैं।
उनका बड़ा मस्तक बड़ी और उपयोगी बातें सोचने के लिए प्रेरित करता है। उनकी छोटी-छोटी आँखे हमें अपने
कार्यों को सूक्ष्म और उचित ढंग से शीघ्र पूर्ण करने हेतु प्रेरित करते हैं औरउनका छोटा मुँह हमें इस बात का स्मरण कराता है कि हमें कम से कम बोलना चाहिए।
युगद्रष्टा लोकमान्य तिलक ने समाज को एकाकार करने के लिए गणेशोत्सव की जो परम्परा कायम की है,
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3> गणेशोत्सव
भारतीय संस्कृति अध्यात्मवादी है, तभी तो उसकाश्रोत कभी सूख नहीं पाता है। वह निरन्तर अलख जगाकर
विपरीत परिस्थितियों को भी आनन्द और उल्लास से जोड़करमानव-जीवन में नवचेतना का संचार करती रहती है।
त्यौहार,पर्व और उत्सव हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है,जिसमें जनमानस घोर विषम परिस्थितियों में
भी जीवन-यापनकरते हुए पर्वों के उल्लास, उमंग में रमकर खुशी का मार्ग तलाश लेते हैं। आज ये पर्व भारतीयता
की पहचान बन चुके हैं।मंगलकर्ता, विध्न विनाशक गणेश जी के जन्मोत्सव की धूमचारों ओर मची है।
कभी महाराष्ट्र में सातवाहन, चालुक्य,राष्ट्रकूट और पेशवा आदि राजाओं द्वारा चलाई गई गणेशोत्सव की प्रथा
आज महाराष्ट्र तक ही सीमित न होकर देश के कोने-कोने में ही नहीं अपितु कई दूसरे राष्ट्रों में भी मनाया जाने
वाला पर्व बन बैठा है। गणेशोत्सव की धूम सार्वजनिक स्थलों में विद्युत साज-सज्जा के साथ छोटी-बड़ी सजी-धजी
प्रतिमाओं के विराजमान होने से तो है ही साथ ही साथ घर-घरमें विभिन्न सुन्दर आकार-प्रकार की प्रतिमाओं के
विराजने से और भी बढ़ जाती है।
भगवान गणेश के कई अवतारों की कथाएं प्रचलित है, लेकिनमुख्य रूप से उनके 8 अवतार प्रसिद्ध हैं,
जिसमें क्रमशः
- पहलाअवतार ‘वक्रतुंड ‘ जिसमें उनके द्वारा ‘मत्सरासुर‘ के अत्याचारों से देवताओं को मुक्ति दिलाने,
- दूसरे अवतार ‘एकदन्त ‘ जिसमें देवता और ऋषि-मुनियों को सताने वाले ‘मदासुर‘ को परास्तकरने,
- तीसरे अवतार ‘महोदर ‘‘ जिसमें ‘मोहासुर‘ को अपनी अमोघशक्ति बल पर समर्पण करने को विवश करने,
- चौथे अवतार ‘गजान न ‘ जिसमें अधर्म, अनीति और अत्याचार के पर्याय बने‘लोभासुर‘ के अभिमान को नष्ट करने,
- पांचवे अवतार ‘लम्बोदर ‘जिसमें सूर्य देव से निरोगी और अमरता का वरदान पाने वाले‘क्रोधासुर‘ की क्रोधाग्नि को मिटाने,
- छठवें अवतार ‘विकट‘ में शिव से वरदान प्राप्त छल-कपट, ईर्ष्या -द्वेष, पाप-झूठ के पर्याय बने कामासुर‘ को अपनी बुद्धिबल और नीतियुक्त वचनों से परास्त करने,
- सातवें अवतार ‘विध्नराज‘ जिसमें ‘ममासुर‘ के अत्याचारों से देव और ऋषि-मुनियों को मुक्ति दिलाने,
- आठवेअवतार ‘धूम्रवर्ण ‘ जिसमें अहंकार के पर्याय ‘अहंकारसुर‘ के अहंकार के मर्दन कर लोक में सुख-शांति की
हमारी संस्कृति में प्राचीन कथा सुविख्यात है कि गणपतिसे प्रार्थना कर महर्षि वेदव्यास ने लोक कल्याणार्थ 60 लाख श्लोकों के रूप में महाभारत की रचना की, जिसमें कहा जाता है कि इनमें से 30 लाख देवलोक, 14 लाख असुर लोक, 15 लाख यक्ष लोक और केवल 1 लाख पृथ्वी लोक पर हैं। महाभारत को वेद भी माना जाता है। इन सभी कथाओं पर यदि थोड़ा बहुत गहन विचार किया जाय तो एक बात जो समरूप दृष्टिगोचर होतीहै- वह यह कि भगवान गणेण जी ने समय-समय पर लोक जीवन में उपजी बुराईयों के पर्याय (प्रतीक) ‘असुर‘ की आसुरी शक्तियों का दमन कर लोक कल्याणर्थ अवतार लेकर सुख-शांति कायम कर यही सन्देश बार-बार दिया कि कोई भी बुराई जब चरम सीमा पर हो तो, उस बुराई का खात्मा करने के प्रयोजनार्थ जरूर आगे बढ़कर उसे खत्म कर लोक में सुख-शांति, समृद्धि कायम करना है। हर वर्ष लोक में व्याप्त ऐसी ही मोह, मद, लोभ, क्रोध, अहंकारादि आसुरी शक्तियों की समाप्ति की मंशा लेकर लिए शायद हम गणपति की स्थापना कर उनसे ज्ञान, बुद्धि देते रहने और सुख-शांति बनाए रखने के उद्देश्यार्थ उत्साहपूर्वक पूजा-आराधना कर उनके कृपा कांक्षी बनना नहीं भूलते हैं। भगवान श्रीगणेश हमारे प्रेरणा के श्रोत हैं- उनकी लम्बी सूंड हमें अपने चारों ओर की घटनाओं की जानकारी देने के साथ ही ज्यादा सीखने के लिए प्रेरित करती है। उनके बड़े-बड़े कान हमें नए विचारों और सुझावों को ध्यान और धैर्यपूर्वक सुनने की सीख देते हैं।
उनका बड़ा मस्तक बड़ी और उपयोगी बातें सोचने के लिए प्रेरित करता है। उनकी छोटी-छोटी आँखे हमें अपने
कार्यों को सूक्ष्म और उचित ढंग से शीघ्र पूर्ण करने हेतु प्रेरित करते हैं औरउनका छोटा मुँह हमें इस बात का स्मरण कराता है कि हमें कम से कम बोलना चाहिए।
युगद्रष्टा लोकमान्य तिलक ने समाज को एकाकार करने के लिए गणेशोत्सव की जो परम्परा कायम की है,
आइये उसे कायम रखें और हर्ष उल्लास से मनाएं।
हर वर्ष फिर से गणपति जी विराजमान हों, इसलिए प्रेम व श्रद्धापूर्वक सब कहते हैं।
''गणपति बप्पा मोरिया, मंगल मुरती मोर्या"
हर वर्ष फिर से गणपति जी विराजमान हों, इसलिए प्रेम व श्रद्धापूर्वक सब कहते हैं।
''गणपति बप्पा मोरिया, मंगल मुरती मोर्या"
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4> गणेश जीके बिंभिन्न रूप
गणेश जी के विभिन्न रूपों की आराधना का महत्त्व...
सफेद आंकड़े के गणेश
तंत्र क्रियाओं में सफेद आंकड़ा (एक प्रकार का पौधा) की जड़ से निर्मित श्रीगणेश का विशेष महत्व है। इसे
श्वेतार्क गणपति भी कहते हैं। कई टोने-टोटकों में श्रीगणेश के इस स्वरूप का उपयोग किया जाता है।
श्वेतार्क गणपति को घर में स्थापित कर विधि-विधान से पूजा करने पर घर में किसी ऊपरी बाधा का असर नहीं होता।
मूंगा गणेश
मूंगा सिंदूरी रंग का एक रत्न होता है। इससे निर्मित श्रीगणेश की प्रतिमा को पूजा स्थान पर स्थापित करने व नित्य
पूजा करने से शत्रुओं का भय समाप्त हो जाता है साथ ही इससे बने श्रीगणेश अपने भक्तों की हर मनोकामना
पूरी करते हैं।
पन्ने के गणेश
पन्ना भी हरे रंग का एक रत्न होता है। इससे निर्मित श्रीगणेश की प्रतिमा की पूजा स्थान पर स्थापित कर
विधि-विधान से पूजा करने पर बुद्धि व यश प्राप्त होता है। विद्यार्थियों के लिए पन्ने के गणेशजी की पूजा करना
श्रेष्ठ होता है।
4> गणेश जीके बिंभिन्न रूप
गणेश जी के विभिन्न रूपों की आराधना का महत्त्व...
सफेद आंकड़े के गणेश
तंत्र क्रियाओं में सफेद आंकड़ा (एक प्रकार का पौधा) की जड़ से निर्मित श्रीगणेश का विशेष महत्व है। इसे
श्वेतार्क गणपति भी कहते हैं। कई टोने-टोटकों में श्रीगणेश के इस स्वरूप का उपयोग किया जाता है।
श्वेतार्क गणपति को घर में स्थापित कर विधि-विधान से पूजा करने पर घर में किसी ऊपरी बाधा का असर नहीं होता।
मूंगा गणेश
मूंगा सिंदूरी रंग का एक रत्न होता है। इससे निर्मित श्रीगणेश की प्रतिमा को पूजा स्थान पर स्थापित करने व नित्य
पूजा करने से शत्रुओं का भय समाप्त हो जाता है साथ ही इससे बने श्रीगणेश अपने भक्तों की हर मनोकामना
पूरी करते हैं।
पन्ने के गणेश
पन्ना भी हरे रंग का एक रत्न होता है। इससे निर्मित श्रीगणेश की प्रतिमा की पूजा स्थान पर स्थापित कर
विधि-विधान से पूजा करने पर बुद्धि व यश प्राप्त होता है। विद्यार्थियों के लिए पन्ने के गणेशजी की पूजा करना
श्रेष्ठ होता है।
चांदी के गणेश
जो लोग धन की इच्छा रखते हैं, उन्हें चांदी से निर्मित गणेश प्रतिमा की पूजा करना चाहिए। इन्हें पूजा घर में
स्थापित कर दूर्वा चढ़ाने से धन-संपत्ति में वृद्धि होती है और धन की आगमन भी तेजी से होने लगता है। इनकी
पूजा करने से जीवन का सुख प्राप्त होता है।
चंदन की लकड़ी के गणेश
चंदन की लकड़ी से निर्मित श्रीगणेश की प्रतिमा घर में कहीं भी स्थापित कर सकते हैं। इससे घर में किसी प्रकार
की विपदा नहीं आती साथ ही परिवार के सदस्यों में सामंजस्य बना रहता है व पारिवारिक माहौल खुशहाल रहता है।
पारद गणेश
धन-संपत्ति प्राप्ति के लिए पारद यानी पारे से निर्मित गणेश प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। यदि किसी ने आपके
घर पर या घर के किसी सदस्य पर तंत्र प्रयोग किया हो तो पारद गणेश की पूजा से उसका कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता।
बांसुरी बजाते गणेश
यदि आपके घर में रोज क्लेश या विवाद होता है तो आपको बांसुरी बजाते हुए श्रीगणेश की तस्वीर या मूर्ति घर में
स्थापित करना चाहिए। बांसुरी बजाते हुए श्रीगणेश की पूजा करने से घर में सुख-शांति का वातावरण रहता है।
हरे रंग के गणेश
हरे रंग के श्रीगणेश की पूजा करने से ज्ञान व बुद्धि की वृद्धि होती है। विद्यार्थियों को विशेषतौर पर हरे रंग की श्रीगणेश की मूर्ति या तस्वीर का पूजन करना चाहिए।
हाथी पर बैठे गणेश
यदि आप धन की इच्छा रखते हैं तो आपको हाथी पर बैठे श्रीगणेश की पूजा करना चाहिए। हाथी पर विराजित
श्रीगणेश की पूजा करने से पैसा, इज्जत व शौहरत मिलती है।
नाचते हुए गणेश
नाचते हुए गणेश की पूजा करने से मन को शांति का अनुभव होता है। यदि आप किसी तनाव में हैं तो आपको
प्रतिदिन नाचते हुए श्रीगणेश की पूजा करना चाहिए।
पंचमुखी गणेश
तंत्र क्रिया की सिद्धि के लिए पंचमुखी श्रीगणेश का पूजन किया जाता है, इससे कोई भी तंत्र क्रिया किसी भी
बाधा के संपन्न हो जाती है
==============================================
5> श्री सिद्धिविनायक---अष्टविनायक स्तोत्र
ॐ गं गणपतये नमः॥श्री सिद्धिविनायक नमो नमः॥अष्टविनायक नमो नमः॥
गजाननं भूत गणादिसेवितम्।कपित्थ जम्बूफल चारु भक्षणम्॥
उमासुतं शोकविनाशकारकं।नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्॥
विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः।निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम्। लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम्॥
सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गज़कर्णकः।लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छ्रणुयादपि॥
विद्यारंम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।संग्रामें संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥
==================================================
जो लोग धन की इच्छा रखते हैं, उन्हें चांदी से निर्मित गणेश प्रतिमा की पूजा करना चाहिए। इन्हें पूजा घर में
स्थापित कर दूर्वा चढ़ाने से धन-संपत्ति में वृद्धि होती है और धन की आगमन भी तेजी से होने लगता है। इनकी
पूजा करने से जीवन का सुख प्राप्त होता है।
चंदन की लकड़ी के गणेश
चंदन की लकड़ी से निर्मित श्रीगणेश की प्रतिमा घर में कहीं भी स्थापित कर सकते हैं। इससे घर में किसी प्रकार
की विपदा नहीं आती साथ ही परिवार के सदस्यों में सामंजस्य बना रहता है व पारिवारिक माहौल खुशहाल रहता है।
पारद गणेश
धन-संपत्ति प्राप्ति के लिए पारद यानी पारे से निर्मित गणेश प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। यदि किसी ने आपके
घर पर या घर के किसी सदस्य पर तंत्र प्रयोग किया हो तो पारद गणेश की पूजा से उसका कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता।
बांसुरी बजाते गणेश
यदि आपके घर में रोज क्लेश या विवाद होता है तो आपको बांसुरी बजाते हुए श्रीगणेश की तस्वीर या मूर्ति घर में
स्थापित करना चाहिए। बांसुरी बजाते हुए श्रीगणेश की पूजा करने से घर में सुख-शांति का वातावरण रहता है।
हरे रंग के गणेश
हरे रंग के श्रीगणेश की पूजा करने से ज्ञान व बुद्धि की वृद्धि होती है। विद्यार्थियों को विशेषतौर पर हरे रंग की श्रीगणेश की मूर्ति या तस्वीर का पूजन करना चाहिए।
हाथी पर बैठे गणेश
यदि आप धन की इच्छा रखते हैं तो आपको हाथी पर बैठे श्रीगणेश की पूजा करना चाहिए। हाथी पर विराजित
श्रीगणेश की पूजा करने से पैसा, इज्जत व शौहरत मिलती है।
नाचते हुए गणेश
नाचते हुए गणेश की पूजा करने से मन को शांति का अनुभव होता है। यदि आप किसी तनाव में हैं तो आपको
प्रतिदिन नाचते हुए श्रीगणेश की पूजा करना चाहिए।
पंचमुखी गणेश
तंत्र क्रिया की सिद्धि के लिए पंचमुखी श्रीगणेश का पूजन किया जाता है, इससे कोई भी तंत्र क्रिया किसी भी
बाधा के संपन्न हो जाती है
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5> श्री सिद्धिविनायक---अष्टविनायक स्तोत्र
ॐ गं गणपतये नमः॥श्री सिद्धिविनायक नमो नमः॥अष्टविनायक नमो नमः॥
गजाननं भूत गणादिसेवितम्।कपित्थ जम्बूफल चारु भक्षणम्॥
उमासुतं शोकविनाशकारकं।नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्॥
विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः।निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम्। लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम्॥
सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गज़कर्णकः।लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छ्रणुयादपि॥
विद्यारंम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।संग्रामें संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥
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