2>श्री गणेश108 नाम***( 1 to 5 )
ॐ नम गणेशाय नमः
1>जानिए भगवान गणेश जी के 108 नाम – संस्कृति।
सनातन धर्म में भगवान को कई नामों से जाना जाता है। वस्तुत: यह नाम देवताओं और महान श्रषियों द्वारा भगवान की स्तुति करने पर प्रकट होते हैं। भगवान गणेश जी को भी कई नामों से जाना जाता है, पर सनातन धर्म से 108 नामों का अलग ही महत्व होता है।
पढ़िए उनमे से उनके मुख्य 108 नाम।
भगवान गणेश नामावली
1. बालगणपति: सबसे प्रिय बालक- - - - - - - - - - - -2. भालचन्द्र: जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो
3. बुद्धिनाथ: बुद्धि के भगवान- - - - - - - - - - - - - -4. धूम्रवर्ण: धुंए को उड़ाने वाला
5. एकाक्षर: एकल अक्षर- - - - - - - - - - - - - - - - - 6. एकदन्त: एक दांत वाले
7. गजकर्ण: हाथी की तरह आंखें वाला- - - - - - - - - -8. गजानन: हाथी के मुँख वाले भगवान
9. गजनान: हाथी के मुख वाले भगवान- - - - - - - - - - 10. गजवक्र: हाथी की सूंड वाला
11. गजवक्त्र: जिसका हाथी की तरह मुँह है- - - - - - - - 12. गणाध्यक्ष: सभी जणों का मालिक
13. गणपति: सभी गणों के मालिक- - - - - - - - - - - - -14. गौरीसुत: माता गौरी का बेटा
15. लम्बकर्ण: बड़े कान वाले देव- - - - - - - - - - - - -16. लम्बोदर: बड़े पेट वाले
17. महाबल: अत्यधिक बलशाली वाले प्रभु- - - - - - - - - 18. महागणपति: देवातिदेव
19. महेश्वर: सारे ब्रह्मांड के भगवान- - - - - - - - - - - - -20. मंगलमूर्त्ति: सभी शुभ कार्य के देव
21. मूषकवाहन: जिसका सारथी मूषक है- - - - - - - - -- 22. निदीश्वरम: धन और निधि के दाता
23. प्रथमेश्वर: सब के बीच प्रथम आने वाला- - - - - - - - - 24. शूपकर्ण: बड़े कान वाले देव
25. शुभम: सभी शुभ कार्यों के प्रभु- - - - - - - - - - - - -26. सिद्धिदाता: इच्छाओं और अवसरों के स्वामी
27. सिद्दिविनायक: सफलता के स्वामी- - - - - - - - - - --28. सुरेश्वरम: देवों के देव
29. वक्रतुण्ड: घुमावदार सूंड- - - - - - - - - - - - - - -- 30. अखूरथ: जिसका सारथी मूषक है
31. अलम्पता: अनन्त देव- - - - - - - - - - - - - - - - -32. अमित: अतुलनीय प्रभु
33. अनन्तचिदरुपम: अनंत और व्यक्ति चेतना- - - - - - - -34. अवनीश: पूरे विश्व के प्रभु
35. अविघ्न: बाधाओं को हरने वाले- - - - - - - - - - - - - -36. भीम: विशाल
37. भूपति: धरती के मालिक- - - - - - - - - - - - - - - - 38. भुवनपति: देवों के देव
39. बुद्धिप्रिय: ज्ञान के दाता- - - - - - - - - - - - - - - - - - --40. बुद्धिविधाता: बुद्धि के मालिक
41. चतुर्भुज: चार भुजाओं वाले- - - - - - - - - - - - - - - -42. देवादेव: सभी भगवान में सर्वोपरी
43. देवांतकनाशकारी: बुराइयों और असुरों के विनाशक- - - -44. देवव्रत: सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले
45. देवेन्द्राशिक: सभी देवताओं की रक्षा करने वाले- - - - - - -46. धार्मिक: दान देने वाला
47. दूर्जा: अपराजित देव- - - - - - - - - - - - - - - - - - 48. द्वैमातुर: दो माताओं वाले
49. एकदंष्ट्र: एक दांत वाले- - - - - - - - - - - - - - - - - -50. ईशानपुत्र: भगवान शिव के बेटे
51. गदाधर: जिसका हथियार गदा है- - - - - - - - - - - - -52. गणाध्यक्षिण: सभी पिंडों के नेता
53. गुणिन: जो सभी गुणों क ज्ञानी- - - - - - - - - - - - - - -54. हरिद्र: स्वर्ण के रंग वाला
55. हेरम्ब: माँ का प्रिय पुत्र- - - - - - - - - - - - - - - - - - -56. कपिल: पीले भूरे रंग वाला
57. कवीश: कवियों के स्वामी- - - - - - - - - - - - - - - - -58. कीर्त्ति: यश के स्वामी
59. कृपाकर: कृपा करने वाले- - - - - - - - - - - - - - - - -60. कृष्णपिंगाश: पीली भूरी आंखवाले
61. क्षेमंकरी: माफी प्रदान करने वाला- - - - - - - - - - - - -62. क्षिप्रा: आराधना के योग्य
63. मनोमय: दिल जीतने वाले- - - - - - - - - - - - - - - - -64. मृत्युंजय: मौत को हरने वाले
65. मूढ़ाकरम: जिन्में खुशी का वास होता है- - - - - - - - - - 66. मुक्तिदायी: शाश्वत आनंद के दाता
67. नादप्रतिष्ठित: जिसे संगीत से प्यार हो-- - - - - -- - - - - - - 68. नमस्थेतु: सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
69. नन्दन: भगवान शिव का बेटा- - - - - - - - - - - - - - --70. सिद्धांथ: सफलता और उपलब्धियों की गुरु
71. पीताम्बर: पीले वस्त्र धारण करने वाला- - - - - - - - - - -72. प्रमोद: आनंद
73. पुरुष: अद्भुत व्यक्तित्व- - - - - - - - - - - - - - - - 74. रक्त: लाल रंग के शरीर वाला
75. रुद्रप्रिय: भगवान शिव के चहीते- - - - - - - - - - - - -76. सर्वदेवात्मन: सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता
77. सर्वसिद्धांत: कौशल और बुद्धि के दाता- - - - - - - - - - -78. सर्वात्मन: ब्रह्मांड की रक्षा करने वाला
79. ओमकार: ओम के आकार वाला- - - - - - - - - - - - 80. शशिवर्णम: जिसका रंग चंद्रमा को भाता हो
81. शुभगुणकानन: जो सभी गुण के गुरु हैं- - - - - - - - - -82. श्वेता: जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध है
83. सिद्धिप्रिय: इच्छापूर्ति वाले- - - - - - - - - - - - - - - 84. स्कन्दपूर्वज: भगवान कार्तिकेय के भाई
85. सुमुख: शुभ मुख वाले- - - - - - - - - - - - - - - 86. स्वरुप: सौंदर्य के प्रेमी
87. तरुण: जिसकी कोई आयु न हो- - - - - - - - - - - -88. उद्दण्ड: शरारती
89. उमापुत्र: पार्वती के बेटे- - - - - - - - - - - - - - -90. वरगणपति: अवसरों के स्वामी
91. वरप्रद: इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता- - - - - - - 92. वरदविनायक: सफलता के स्वामी
93. वीरगणपति: वीर प्रभु- - - - - - - - - - - - - - -94. विद्यावारिधि: बुद्धि की देव
95. विघ्नहर: बाधाओं को दूर करने वाले- - - - - - - - - -96. विघ्नहर्त्ता: बुद्धि की देव
97. विघ्नविनाशन: बाधाओं का अंत करने वाले- - - - - - - - -98. विघ्नराज: सभी बाधाओं के मालिक
99. विघ्नराजेन्द्र: सभी बाधाओं के भगवान- - - - - - - - -- 100. विघ्नविनाशाय: सभी बाधाओं का नाश करने वाला
101. विघ्नेश्वर: सभी बाधाओं के हरने वाले भगवान- - - - - -102. विकट: अत्यंत विशाल
103. विनायक: सब का भगवान- - - - - - - - - - - - - -104. विश्वमुख: ब्रह्मांड के गुरु
105. विश्वराजा: संसार के स्वामी- - - - - - - - - - --- - -105. यज्ञकाय: सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - --106. यशस्कर: प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी
107. यशस्विन: सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव- - - - - - -108. योगाधिप: ध्यान के प्रभु
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2>गणेश अष्टोत्तर शत नामा
ॐ गजाननाय नमः(1)
ॐ गणाध्यक्षाय नमः ॐ विघ्नाराजाय नम: ॐ विनायकाय नमः----------------------(4)
ॐ द्त्वेमातुराय नमः ॐ द्विमुखाय नमः ॐ प्रमुखाय नमः---------------------------(7)
ॐ सुमुखाय नमः ॐ कृतिने नमः ॐ सुप्रदीपाय नमः------------------------------- (10)
ॐ सुख निधये नमः ॐ सुराध्यक्षाय नमः ॐ सुरारिघ्नाय नमः------------------------(13)
ॐ महागणपतये नमः ॐ मान्याय नमः ॐ महा कालाय नमः-----------------------(16)
ॐ महा बलाय नमः ॐ हेरम्बाय नमः ॐ लम्ब जठराय नमः------------------------(19)
ॐ ह्रस्व ग्रीवाय नमः (20)ॐ महोदराय नमःॐ मदोत्कटाय नमः-------------------(22)
ॐ महावीराय नमः ॐ मन्त्रिणे नमः ॐ मङ्गल स्वराय नमः--------------------------(25)
ॐ प्रमधाय नमः ॐ प्रथमाय नमः ॐ प्राज्ञाय नमः------------------------------------(28)
ॐ विघ्नकर्त्रे नमः ॐ विघ्नहन्त्रे नमः (30) ॐ विश्व नेत्रे नमः---------------------------(31)
ॐ विराट्पतये नमः ॐ श्रीपतये नमः ॐ वाक्पतये नमः-----------------------------(34)
ॐ शृङ्गारिणे नमः ॐ अश्रित वत्सलाय नमःॐ शिवप्रियाय नमः---------------------(37)
ॐ शीघ्रकारिणे नमः ॐ शाश्वताय नमः ॐ बलाय नमः----------------------------- (40)
ॐ बलोत्थिताय नमः ॐ भवात्मजाय नमः ॐ पुराण पुरुषाय नमः-------------------(43)
ॐ पूष्णे नमः ॐ पुष्करोत्षिप्त वारिणे नमःॐ अग्रगण्याय नमः----------------------(46)
ॐ अग्रपूज्याय नमः ॐ अग्रगामिने नमः ॐ मन्त्रकृते नमः---------------------------(49)
ॐ चामीकर प्रभाय नमः (50)ॐ सर्वाय नमः ॐ सर्वोपास्याय नमः------------------(52)
ॐ सर्व कर्त्रे नमः ॐ सर्वनेत्रे नमः ॐ सर्वसिध्धि प्रदाय नमः--------------------------(55)
ॐ सर्व सिद्धये नमः ॐ पञ्चहस्ताय नमः ॐ पार्वतीनन्दनाय नमः--------------------(58)
ॐ प्रभवे नमः ॐ कुमार गुरवे नमः (60)ॐ अक्षोभ्याय नमः--------------------------(61)
ॐ कुञ्जरासुर भञ्जनाय नमःॐ प्रमोदाय नमः ॐ मोदकप्रियाय नमः-----------------(64)
ॐ कान्तिमते नमः ॐ धृतिमते नमः ॐ कामिने नमः---------------------------------(67)
ॐ कपित्थवन प्रियाय नमःॐ ब्रह्मचारिणे नमः ॐ ब्रह्मरूपिणे नमः------------------ (70)
ॐ ब्रह्मविद्यादि दानभुवे नमःॐ जिष्णवे नमः ॐ विष्णुप्रियाय नमः-------------------(73)
ॐ भक्त जीविताय नमःॐ जित मन्मथाय नमः ॐ ऐश्वर्य कारणाय नमः--------------(76)
ॐ ज्यायसे नमः ॐ यक्षकिन्नेर सेविताय नमःॐ गङ्गा सुताय नमः--------------------(79)
ॐ गणाधीशाय नमः (80)ॐ गम्भीर निनदाय नमःॐ वटवे नमः----------------------(82)
ॐ अभीष्ट वरदायिने नमःॐ ज्योतिषे नमः ॐ भक्त निथये नमः----------------------(85)
ॐ भाव गम्याय नमः ॐ मङ्गल प्रदाय नमः ॐ अव्वक्ताय नमः-----------------------(88)
ॐ अप्राकृत पराक्रमाय नमःॐ सत्य धर्मिणे नमः (90)ॐ सखये नमः----------------(91)
ॐ सरसाम्बु निथये नमः ॐ महेशाय नमः ॐ दिव्याङ्गाय नमः------------------------(94)
ॐ मणिकिङ्किणी मेखालाय नमःॐ समस्त देवता मूर्तये नमः--------------------------(96)
ॐ सहिष्णवे नमः ॐ सततोत्थिताय नमः ॐ विघात कारिणे नमः----------------------(99)
ॐ विश्वग्दृशे नमः (100)ॐ विश्वरक्षाकृते नमः ॐ कल्याण गुरवे नमः------------------(102)
ॐ उन्मत्त वेषाय नमः ॐ अपराजिते नमः ॐ समस्त जगदाधाराय नमः---------------(105)
ॐ सर्त्वेश्वर्य प्रदाय नमः ॐ आक्रान्त चिद चित्प्रभवे नमः--------------------------------(107)
ॐ श्री विघ्नेश्वराय नमः-------------------------------------------------------------------- (108)
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3>श्रीगणेश के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का झूठा आरोप!
भगवान गणेश का जन्म दिवस गणेश चतुर्थी के से जुडी है ये अद्भुद पौराणिक कथा, भागद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था, इस दिन को विशेष तौर पे महाराष्ट्र में बड़े धूम धाम से मनाया जाता हैं और ये उतसव पुरे दस दिनों तक चलता है( लोकमान्य तिलक ने शुरू करवाया था.).
गणेश चतुर्थी के दिन गणेश को चन्द्रलोक में भोज का निमंत्रण था, गणेश को मोदक प्रिय है और मोदक ही भोजन में था ऐसे में टूट पड़े और इतना ही नही बच्चे खुले लड्डू भी अपने साथ समेट के ले गए. एक दम दबाके लड्डू खाए गणेश को नींद भी आने लगी और निकलते समय ही वो गिर पड़े और पुरे लड्डू बिखर गए, लेकिन ये दिख चन्द्रदेव अपनी हंसी न रोक पाये और जोर जोर से हंस पड़े.
इस पर गणेश क्रोधित हो गए और उन्हें श्राप दे डाला की मुझपे हंसने वाले जो तुझे देखेगा उसपे चोरी का झूठा नाम लग जायेगा और वो बदनाम होगा, अपनी प्रतिष्ठा पर बात आते देख चन्द्रदेव घबरा के गणेश के चरणो में गिर गए और क्षमा याचना करने लगे. कुछ देर बाद गणेश का गुस्सा शांत हुआ लेकिन उन्होंने श्राप को चतुर्थी के दिन जारी रखा, तब से चतुर्थी के दिन चाँद को नही देखा जाता है अगर देख ले तो अनिष्ट हो जाता है.
कृष्ण पर चोरी का झूठा आरोप: द्वापर युग में एक राजा था नाम था, जिनका नाम था सत्राजित उन्होंने सूर्य को प्रसन्न कर स्यमन्तक मणि वरदान में पाली थी. वो मणि रोज आठ भरी सोना देती थी और जन्हा वो रहती थी( जिसके पास) वंहा कोई समस्या नही होती थी.
एक दिन जब कृष्ण खेल रहे थे तो सत्राजित मणि सर पर लगा उनसे मिलने पहुंचे जिसे देख कृष्ण ने कहा की इस मणि के अधिकारी तो राजा उग्रसेन जी है। बात सुन सत्राजित बिना कुछ बोले ही वहाँ से उठ कर चले गए, मणि को अपने घर के मन्दिर में स्थापित कर दिया।
गणेश चतुर्थी का दिन था और कृष्ण अपने महल में खड़े थे और उनकी नजर चन्द्र पे पड़ गई, तब रुक्मणी जी को बड़ी चिंता हुई की मेरे पति किस मुसीबत में पड़ने वाले है. उसी दिन राजा का भाई स्यमन्तक को पहन कर घोड़े पर सवार हो शिकार पे निकला जन्हा एक सिंह ने उसे मार गिराया। मणि भी उसके पेट में चली गई जिसे ऋक्षराज जामवंत ने मारा और वह मणि पाली और अपनी गुफा में चला गया। जामवंत ने उस मणि को अपने बालक को दे दिया जो उसे खिलौना समझ उससे खेलने लगा।
भाई के गायब होने पर राजा ने बिना सोचे कृष्ण जी पर हत्या और चोरी के आरोप फैला दिए। आरोप झुटलाने के लिए श्री कृष्ण वन में गए जन्हा उन्होंने घोड़ा सहित प्रसेनजित को मरा हुआ देखा पर मणि नहीं दिखी। निकट ही सिंह के पंजों के चिन्ह थे, जिनके सहारे आगे बढ़ने पर उन्हें मरे हुए सिंह का शरीर मिला। वहाँ पर रीछ के पैरों के पद-चिन्ह भी मिले जो कि एक गुफा तक गये थे।
तब जामवंत से अठाईस दिन तक युद्ध कर उन्होंने पूर्व राम जन्म का वादा जामवंत से पूरा किया और मणि वापस देकर अपना कलंक हटाया. जामवंत ने अपनी पुत्री जामवंत का हाथ भगवान के हाथ में दिया और शर्मवश राजा सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवहा कृष्ण से कर अपने पाप का प्रायश्चित किया.
जब गणेश को ये पता चला तो उन्होंने गणेश चतुर्थी के दिन को भी चन्द्र को श्राप मुक्त कर दिया, इस कारन गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र को देखने से दोष नही लगता है. गणपति बाप्पा मोरेया.
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4>.==भगवान गणेश थे बालब्रह्मचारी, फिर कैसे की दो शादिया?
भगवान गणेश बालब्रह्मचारी थे लेकिन बाद में ऐसा क्या हो गया की उन्होंने एक नही दो दो शादिया की? इसके लिए पौराणो के गर्भ में जाना होगा आपको लेकिन हम है न. सति तुलसी का नाम तो अपने सुना ही होगा जो की जालंधर से ब्याही गई और बाद में भगवान विष्णु के छलावे के चलते उन्हें श्राप दे पत्थर का बना दिया.
इन्ही सति की जब असुरराज जालंधर से शादी नही हुई थी तो उन्होंने एक बार गणेश को देख उन्हें अपने पति रूप में पानी की इच्छा इन्ही बालब्रह्मचारी गणेश से कर दी. बस फिर क्या था भड़क गए गणेश और कर दिया इंकार, इस पर तुलसी ने गणेश को श्राप दिया की जिस ब्रह्मचर्य पे तुम अकड़ रहे हो वो नही रहेगा और तुम्हारी दो दो शादिया होगी, तब गणेश ने भी श्राप दिया की तुम्हारी एक असुर से शादी होगी.
फिर भी शादी तो अपने से नही होती है, तो सुनिए एक बाद दक्षराज अपनी दो बेटियो की शादी को लेकर चिंतित थे तो नारद ने उन्हें शिव पारवती से अपनी चिंता जताने को कहा. चूँकि नारद सब जानते थे की शिव पारवती के तो पुत्र है, ऐसे में दक्षराज अपनी दोनों बेटियो को बहु रूप में स्वीकार करने की विनती महादेव और सति से करने लगा.
लेकिन दोनों बेटियो की एक शर्त भी थी की वो शादी एक ही पुरुष से करेगी, ऐसे में महादेव और पारवती संशय में थे. दोनों ने एक तरीका निकला दोनों पुत्रो को शादी के बारे में बिना बताये ही दोनों में एक प्रतिस्पर्धा रखी जिसका इनाम शादी थी, प्रतियोगिता ये थी को जो भाई पुरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा सात बार सबसे पहले कर के आएगा वही जीतेगा.
कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मोर को तुरंत निकल लिए लेकिन मूषक की सवारी करने वाले गणेश वंही रुके, चूँकि उनका वाहन काफी धीमा था तो उन्होंने बुद्धि का इस्तेमाल किया.
माता पिता को एक चौक्की पे बैठाया और उनके सात परिक्रमा कर जीत का दावा किया. उनका तर्क था की माता पिता की तुलना शास्त्रो में ब्रह्माण्ड से की है तो मैं जीत गया, गणेश की बुद्धिमता देख माता पिता प्रसन्न हुए पर जब कार्तिकेय आया तो इसे छल समझ वंहा से नाराज हो चले गए
तब गणेश को इनाम में शादी मिली जो उनके न चाहने पर भी उन्हें माता पिता की आज्ञा और जीत के तोहफे के रूप में स्वीकार करनी पड़ी सति तुलसी का श्राप भी पूरा हुआ और दक्षराज की समस्या भी. दोनों पत्नियों का नाम ऋद्धि और सिद्धि था, और उनसे शुभ और लाभ नाम के दो पुत्र भी हुए गणेश के, जो आज भी व्यापारियों के लिए प्रथम पूजनीय है.
गणपति बाप्पा मोरया.
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5>कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक
कहते है की इंसान का वर्तमान, उसके पिछले कर्मो पर और भविष्य वर्तमान कर्मों पर आधारित होता है। लेकिन यह बात केवल इंसानो पर ही नहीं अपितु भगवानों पर भी लागू होती है। हमारे पुराणों में अनेक ऐसी कथाएँ है जब भगवान द्वारा अतीत में किये गए अनुचित कार्यों के कारण उन्हें आने वाले समय में कष्ट उठाने पड़े। ऐसी ही एक कहानी भगवान शंकर से सम्बंधित है जब उन्हें कश्यप ऋषि द्वारा दिए गए शाप के कारण अपने ही पुत्र गणेश का मस्तक काटना पड़ा।
भगवान गणेश का जन्म की कहानी :
देवी पार्वती ने एक बार शिवजी के गण नन्दी के द्वारा उनकी आज्ञा पालन में त्रुटि के कारण अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना और किसी की नहीं। देवी पार्वती ने यह भी कहा कि मैं स्नान के लिए जा रही हूं। कोई भी अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शंकर आए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे।
यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया। बालक का हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। देवी पार्वती ने जब यह देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गई। उनकी क्रोध की अग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा।
तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया। तब भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।
कश्यप ऋषि ने दिया था शिव जी को शाप :
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार नारद जी ने श्री नारायण से पूछा कि प्रभु आप बहुत विद्वान है और सभी वेदों को जानने वाले हैं। मैं आप से ये जानना चाहता हूं कि जो भगवान शंकर सभी परेशानियों को दूर करने वाले माने जाते हैं। उन्होंने क्यों अपने पुत्र गणेश की के मस्तक को काट दिया।
यह सुनकर श्रीनारायण ने कहा नारद एक समय की बात है। शंकर ने माली और सुुमाली को मारने वाले सूर्य पर बड़े क्रोध में त्रिशूल से प्रहार किया। सूर्य भी शिव के समान तेजस्वी और शक्तिशाली था। इसलिए त्रिशूल की चोट से सूर्य की चेतना नष्ट हो गई। वह तुरंत रथ से नीचे गिर पड़ा। जब कश्यपजी ने देखा कि मेरा पुत्र मरने की अवस्था में हैं। तब वे उसे छाती से लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओं में हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोर से रुदन करने लगे। अंधकार छा जाने से सारे जगत में अंधेरा हो गया। तब ब्रह्मा के पौत्र तपस्वी कश्यप जी ने शिव जी को शाप दिया वे बोले जैसा आज तुम्हारे प्रहार के कारण मेरे पुत्र का हाल हो रहा है। ठीक वैसे ही तुम्हारे पुत्र पर भी होगा। तुम्हारे पुत्र का मस्तक कट जाएगा।
यह सुनकर भोलेनाथ का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने सूर्य को फिर से जीवित कर दिया। सूर्य कश्यप जी के सामने खड़े हो गए। जब उन्हें कश्यप जी के शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी का त्याग करने का निर्णय लिया। यह सुनकर देवताओं की प्रेरणा से भगवान ब्रह्मा सूर्य के पास पहुंचे और उन्हें उनके काम पर नियुक्त किया।
ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनंद से सूर्य को आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवन चले गए। इधर सूर्य भी अपनी राशि पर आरूढ़ हुए। इसके बाद माली और सुमाली को सफेद कोढ़ हो गया, जिससे उनका प्रभाव नष्ट हो गया। तब स्वयं ब्रह्मा ने उन दोनों से कहा-सूर्य के कोप से तुम दोनों का तेज खत्म हो गया है। तुम्हारा शरीर खराब हो गया है। तुम सूर्य की आराधना करो। उन दोनों ने सूर्य की आराधना शुरू की और फिर से निरोगी हो गए।
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1>----------------जानिए भगवान गणेश जी के 108 नाम – संस्कृ
2>-----------------गणेश अष्टोत्तर शत नामा
3>-----------------श्रीगणेश के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का झूठा आरोप!=+mtl
4>-----------------भगवान गणेश थे बालब्रह्मचारी, फिर कैसे की दो शादिया?=+mtl
5>------------------कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक=+mtl
2>-----------------गणेश अष्टोत्तर शत नामा
3>-----------------श्रीगणेश के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का झूठा आरोप!=+mtl
4>-----------------भगवान गणेश थे बालब्रह्मचारी, फिर कैसे की दो शादिया?=+mtl
5>------------------कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक=+mtl
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> SPIRITUAL=ধার্মিক বিষয়=(4 )
ॐ नम गणेशाय नमः
1>जानिए भगवान गणेश जी के 108 नाम – संस्कृति।
सनातन धर्म में भगवान को कई नामों से जाना जाता है। वस्तुत: यह नाम देवताओं और महान श्रषियों द्वारा भगवान की स्तुति करने पर प्रकट होते हैं। भगवान गणेश जी को भी कई नामों से जाना जाता है, पर सनातन धर्म से 108 नामों का अलग ही महत्व होता है।
पढ़िए उनमे से उनके मुख्य 108 नाम।
भगवान गणेश नामावली
1. बालगणपति: सबसे प्रिय बालक- - - - - - - - - - - -2. भालचन्द्र: जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो
3. बुद्धिनाथ: बुद्धि के भगवान- - - - - - - - - - - - - -4. धूम्रवर्ण: धुंए को उड़ाने वाला
5. एकाक्षर: एकल अक्षर- - - - - - - - - - - - - - - - - 6. एकदन्त: एक दांत वाले
7. गजकर्ण: हाथी की तरह आंखें वाला- - - - - - - - - -8. गजानन: हाथी के मुँख वाले भगवान
9. गजनान: हाथी के मुख वाले भगवान- - - - - - - - - - 10. गजवक्र: हाथी की सूंड वाला
11. गजवक्त्र: जिसका हाथी की तरह मुँह है- - - - - - - - 12. गणाध्यक्ष: सभी जणों का मालिक
13. गणपति: सभी गणों के मालिक- - - - - - - - - - - - -14. गौरीसुत: माता गौरी का बेटा
15. लम्बकर्ण: बड़े कान वाले देव- - - - - - - - - - - - -16. लम्बोदर: बड़े पेट वाले
17. महाबल: अत्यधिक बलशाली वाले प्रभु- - - - - - - - - 18. महागणपति: देवातिदेव
19. महेश्वर: सारे ब्रह्मांड के भगवान- - - - - - - - - - - - -20. मंगलमूर्त्ति: सभी शुभ कार्य के देव
21. मूषकवाहन: जिसका सारथी मूषक है- - - - - - - - -- 22. निदीश्वरम: धन और निधि के दाता
23. प्रथमेश्वर: सब के बीच प्रथम आने वाला- - - - - - - - - 24. शूपकर्ण: बड़े कान वाले देव
25. शुभम: सभी शुभ कार्यों के प्रभु- - - - - - - - - - - - -26. सिद्धिदाता: इच्छाओं और अवसरों के स्वामी
27. सिद्दिविनायक: सफलता के स्वामी- - - - - - - - - - --28. सुरेश्वरम: देवों के देव
29. वक्रतुण्ड: घुमावदार सूंड- - - - - - - - - - - - - - -- 30. अखूरथ: जिसका सारथी मूषक है
31. अलम्पता: अनन्त देव- - - - - - - - - - - - - - - - -32. अमित: अतुलनीय प्रभु
33. अनन्तचिदरुपम: अनंत और व्यक्ति चेतना- - - - - - - -34. अवनीश: पूरे विश्व के प्रभु
35. अविघ्न: बाधाओं को हरने वाले- - - - - - - - - - - - - -36. भीम: विशाल
37. भूपति: धरती के मालिक- - - - - - - - - - - - - - - - 38. भुवनपति: देवों के देव
39. बुद्धिप्रिय: ज्ञान के दाता- - - - - - - - - - - - - - - - - - --40. बुद्धिविधाता: बुद्धि के मालिक
41. चतुर्भुज: चार भुजाओं वाले- - - - - - - - - - - - - - - -42. देवादेव: सभी भगवान में सर्वोपरी
43. देवांतकनाशकारी: बुराइयों और असुरों के विनाशक- - - -44. देवव्रत: सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले
45. देवेन्द्राशिक: सभी देवताओं की रक्षा करने वाले- - - - - - -46. धार्मिक: दान देने वाला
47. दूर्जा: अपराजित देव- - - - - - - - - - - - - - - - - - 48. द्वैमातुर: दो माताओं वाले
49. एकदंष्ट्र: एक दांत वाले- - - - - - - - - - - - - - - - - -50. ईशानपुत्र: भगवान शिव के बेटे
51. गदाधर: जिसका हथियार गदा है- - - - - - - - - - - - -52. गणाध्यक्षिण: सभी पिंडों के नेता
53. गुणिन: जो सभी गुणों क ज्ञानी- - - - - - - - - - - - - - -54. हरिद्र: स्वर्ण के रंग वाला
55. हेरम्ब: माँ का प्रिय पुत्र- - - - - - - - - - - - - - - - - - -56. कपिल: पीले भूरे रंग वाला
57. कवीश: कवियों के स्वामी- - - - - - - - - - - - - - - - -58. कीर्त्ति: यश के स्वामी
59. कृपाकर: कृपा करने वाले- - - - - - - - - - - - - - - - -60. कृष्णपिंगाश: पीली भूरी आंखवाले
61. क्षेमंकरी: माफी प्रदान करने वाला- - - - - - - - - - - - -62. क्षिप्रा: आराधना के योग्य
63. मनोमय: दिल जीतने वाले- - - - - - - - - - - - - - - - -64. मृत्युंजय: मौत को हरने वाले
65. मूढ़ाकरम: जिन्में खुशी का वास होता है- - - - - - - - - - 66. मुक्तिदायी: शाश्वत आनंद के दाता
67. नादप्रतिष्ठित: जिसे संगीत से प्यार हो-- - - - - -- - - - - - - 68. नमस्थेतु: सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
69. नन्दन: भगवान शिव का बेटा- - - - - - - - - - - - - - --70. सिद्धांथ: सफलता और उपलब्धियों की गुरु
71. पीताम्बर: पीले वस्त्र धारण करने वाला- - - - - - - - - - -72. प्रमोद: आनंद
73. पुरुष: अद्भुत व्यक्तित्व- - - - - - - - - - - - - - - - 74. रक्त: लाल रंग के शरीर वाला
75. रुद्रप्रिय: भगवान शिव के चहीते- - - - - - - - - - - - -76. सर्वदेवात्मन: सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता
77. सर्वसिद्धांत: कौशल और बुद्धि के दाता- - - - - - - - - - -78. सर्वात्मन: ब्रह्मांड की रक्षा करने वाला
79. ओमकार: ओम के आकार वाला- - - - - - - - - - - - 80. शशिवर्णम: जिसका रंग चंद्रमा को भाता हो
81. शुभगुणकानन: जो सभी गुण के गुरु हैं- - - - - - - - - -82. श्वेता: जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध है
83. सिद्धिप्रिय: इच्छापूर्ति वाले- - - - - - - - - - - - - - - 84. स्कन्दपूर्वज: भगवान कार्तिकेय के भाई
85. सुमुख: शुभ मुख वाले- - - - - - - - - - - - - - - 86. स्वरुप: सौंदर्य के प्रेमी
87. तरुण: जिसकी कोई आयु न हो- - - - - - - - - - - -88. उद्दण्ड: शरारती
89. उमापुत्र: पार्वती के बेटे- - - - - - - - - - - - - - -90. वरगणपति: अवसरों के स्वामी
91. वरप्रद: इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता- - - - - - - 92. वरदविनायक: सफलता के स्वामी
93. वीरगणपति: वीर प्रभु- - - - - - - - - - - - - - -94. विद्यावारिधि: बुद्धि की देव
95. विघ्नहर: बाधाओं को दूर करने वाले- - - - - - - - - -96. विघ्नहर्त्ता: बुद्धि की देव
97. विघ्नविनाशन: बाधाओं का अंत करने वाले- - - - - - - - -98. विघ्नराज: सभी बाधाओं के मालिक
99. विघ्नराजेन्द्र: सभी बाधाओं के भगवान- - - - - - - - -- 100. विघ्नविनाशाय: सभी बाधाओं का नाश करने वाला
101. विघ्नेश्वर: सभी बाधाओं के हरने वाले भगवान- - - - - -102. विकट: अत्यंत विशाल
103. विनायक: सब का भगवान- - - - - - - - - - - - - -104. विश्वमुख: ब्रह्मांड के गुरु
105. विश्वराजा: संसार के स्वामी- - - - - - - - - - --- - -105. यज्ञकाय: सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
-- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - --106. यशस्कर: प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी
107. यशस्विन: सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव- - - - - - -108. योगाधिप: ध्यान के प्रभु
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2>गणेश अष्टोत्तर शत नामा
ॐ गजाननाय नमः(1)
ॐ गणाध्यक्षाय नमः ॐ विघ्नाराजाय नम: ॐ विनायकाय नमः----------------------(4)
ॐ द्त्वेमातुराय नमः ॐ द्विमुखाय नमः ॐ प्रमुखाय नमः---------------------------(7)
ॐ सुमुखाय नमः ॐ कृतिने नमः ॐ सुप्रदीपाय नमः------------------------------- (10)
ॐ सुख निधये नमः ॐ सुराध्यक्षाय नमः ॐ सुरारिघ्नाय नमः------------------------(13)
ॐ महागणपतये नमः ॐ मान्याय नमः ॐ महा कालाय नमः-----------------------(16)
ॐ महा बलाय नमः ॐ हेरम्बाय नमः ॐ लम्ब जठराय नमः------------------------(19)
ॐ ह्रस्व ग्रीवाय नमः (20)ॐ महोदराय नमःॐ मदोत्कटाय नमः-------------------(22)
ॐ महावीराय नमः ॐ मन्त्रिणे नमः ॐ मङ्गल स्वराय नमः--------------------------(25)
ॐ प्रमधाय नमः ॐ प्रथमाय नमः ॐ प्राज्ञाय नमः------------------------------------(28)
ॐ विघ्नकर्त्रे नमः ॐ विघ्नहन्त्रे नमः (30) ॐ विश्व नेत्रे नमः---------------------------(31)
ॐ विराट्पतये नमः ॐ श्रीपतये नमः ॐ वाक्पतये नमः-----------------------------(34)
ॐ शृङ्गारिणे नमः ॐ अश्रित वत्सलाय नमःॐ शिवप्रियाय नमः---------------------(37)
ॐ शीघ्रकारिणे नमः ॐ शाश्वताय नमः ॐ बलाय नमः----------------------------- (40)
ॐ बलोत्थिताय नमः ॐ भवात्मजाय नमः ॐ पुराण पुरुषाय नमः-------------------(43)
ॐ पूष्णे नमः ॐ पुष्करोत्षिप्त वारिणे नमःॐ अग्रगण्याय नमः----------------------(46)
ॐ अग्रपूज्याय नमः ॐ अग्रगामिने नमः ॐ मन्त्रकृते नमः---------------------------(49)
ॐ चामीकर प्रभाय नमः (50)ॐ सर्वाय नमः ॐ सर्वोपास्याय नमः------------------(52)
ॐ सर्व कर्त्रे नमः ॐ सर्वनेत्रे नमः ॐ सर्वसिध्धि प्रदाय नमः--------------------------(55)
ॐ सर्व सिद्धये नमः ॐ पञ्चहस्ताय नमः ॐ पार्वतीनन्दनाय नमः--------------------(58)
ॐ प्रभवे नमः ॐ कुमार गुरवे नमः (60)ॐ अक्षोभ्याय नमः--------------------------(61)
ॐ कुञ्जरासुर भञ्जनाय नमःॐ प्रमोदाय नमः ॐ मोदकप्रियाय नमः-----------------(64)
ॐ कान्तिमते नमः ॐ धृतिमते नमः ॐ कामिने नमः---------------------------------(67)
ॐ कपित्थवन प्रियाय नमःॐ ब्रह्मचारिणे नमः ॐ ब्रह्मरूपिणे नमः------------------ (70)
ॐ ब्रह्मविद्यादि दानभुवे नमःॐ जिष्णवे नमः ॐ विष्णुप्रियाय नमः-------------------(73)
ॐ भक्त जीविताय नमःॐ जित मन्मथाय नमः ॐ ऐश्वर्य कारणाय नमः--------------(76)
ॐ ज्यायसे नमः ॐ यक्षकिन्नेर सेविताय नमःॐ गङ्गा सुताय नमः--------------------(79)
ॐ गणाधीशाय नमः (80)ॐ गम्भीर निनदाय नमःॐ वटवे नमः----------------------(82)
ॐ अभीष्ट वरदायिने नमःॐ ज्योतिषे नमः ॐ भक्त निथये नमः----------------------(85)
ॐ भाव गम्याय नमः ॐ मङ्गल प्रदाय नमः ॐ अव्वक्ताय नमः-----------------------(88)
ॐ अप्राकृत पराक्रमाय नमःॐ सत्य धर्मिणे नमः (90)ॐ सखये नमः----------------(91)
ॐ सरसाम्बु निथये नमः ॐ महेशाय नमः ॐ दिव्याङ्गाय नमः------------------------(94)
ॐ मणिकिङ्किणी मेखालाय नमःॐ समस्त देवता मूर्तये नमः--------------------------(96)
ॐ सहिष्णवे नमः ॐ सततोत्थिताय नमः ॐ विघात कारिणे नमः----------------------(99)
ॐ विश्वग्दृशे नमः (100)ॐ विश्वरक्षाकृते नमः ॐ कल्याण गुरवे नमः------------------(102)
ॐ उन्मत्त वेषाय नमः ॐ अपराजिते नमः ॐ समस्त जगदाधाराय नमः---------------(105)
ॐ सर्त्वेश्वर्य प्रदाय नमः ॐ आक्रान्त चिद चित्प्रभवे नमः--------------------------------(107)
ॐ श्री विघ्नेश्वराय नमः-------------------------------------------------------------------- (108)
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3>श्रीगणेश के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का झूठा आरोप!
भगवान गणेश का जन्म दिवस गणेश चतुर्थी के से जुडी है ये अद्भुद पौराणिक कथा, भागद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था, इस दिन को विशेष तौर पे महाराष्ट्र में बड़े धूम धाम से मनाया जाता हैं और ये उतसव पुरे दस दिनों तक चलता है( लोकमान्य तिलक ने शुरू करवाया था.).
गणेश चतुर्थी के दिन गणेश को चन्द्रलोक में भोज का निमंत्रण था, गणेश को मोदक प्रिय है और मोदक ही भोजन में था ऐसे में टूट पड़े और इतना ही नही बच्चे खुले लड्डू भी अपने साथ समेट के ले गए. एक दम दबाके लड्डू खाए गणेश को नींद भी आने लगी और निकलते समय ही वो गिर पड़े और पुरे लड्डू बिखर गए, लेकिन ये दिख चन्द्रदेव अपनी हंसी न रोक पाये और जोर जोर से हंस पड़े.
इस पर गणेश क्रोधित हो गए और उन्हें श्राप दे डाला की मुझपे हंसने वाले जो तुझे देखेगा उसपे चोरी का झूठा नाम लग जायेगा और वो बदनाम होगा, अपनी प्रतिष्ठा पर बात आते देख चन्द्रदेव घबरा के गणेश के चरणो में गिर गए और क्षमा याचना करने लगे. कुछ देर बाद गणेश का गुस्सा शांत हुआ लेकिन उन्होंने श्राप को चतुर्थी के दिन जारी रखा, तब से चतुर्थी के दिन चाँद को नही देखा जाता है अगर देख ले तो अनिष्ट हो जाता है.
कृष्ण पर चोरी का झूठा आरोप: द्वापर युग में एक राजा था नाम था, जिनका नाम था सत्राजित उन्होंने सूर्य को प्रसन्न कर स्यमन्तक मणि वरदान में पाली थी. वो मणि रोज आठ भरी सोना देती थी और जन्हा वो रहती थी( जिसके पास) वंहा कोई समस्या नही होती थी.
एक दिन जब कृष्ण खेल रहे थे तो सत्राजित मणि सर पर लगा उनसे मिलने पहुंचे जिसे देख कृष्ण ने कहा की इस मणि के अधिकारी तो राजा उग्रसेन जी है। बात सुन सत्राजित बिना कुछ बोले ही वहाँ से उठ कर चले गए, मणि को अपने घर के मन्दिर में स्थापित कर दिया।
गणेश चतुर्थी का दिन था और कृष्ण अपने महल में खड़े थे और उनकी नजर चन्द्र पे पड़ गई, तब रुक्मणी जी को बड़ी चिंता हुई की मेरे पति किस मुसीबत में पड़ने वाले है. उसी दिन राजा का भाई स्यमन्तक को पहन कर घोड़े पर सवार हो शिकार पे निकला जन्हा एक सिंह ने उसे मार गिराया। मणि भी उसके पेट में चली गई जिसे ऋक्षराज जामवंत ने मारा और वह मणि पाली और अपनी गुफा में चला गया। जामवंत ने उस मणि को अपने बालक को दे दिया जो उसे खिलौना समझ उससे खेलने लगा।
भाई के गायब होने पर राजा ने बिना सोचे कृष्ण जी पर हत्या और चोरी के आरोप फैला दिए। आरोप झुटलाने के लिए श्री कृष्ण वन में गए जन्हा उन्होंने घोड़ा सहित प्रसेनजित को मरा हुआ देखा पर मणि नहीं दिखी। निकट ही सिंह के पंजों के चिन्ह थे, जिनके सहारे आगे बढ़ने पर उन्हें मरे हुए सिंह का शरीर मिला। वहाँ पर रीछ के पैरों के पद-चिन्ह भी मिले जो कि एक गुफा तक गये थे।
तब जामवंत से अठाईस दिन तक युद्ध कर उन्होंने पूर्व राम जन्म का वादा जामवंत से पूरा किया और मणि वापस देकर अपना कलंक हटाया. जामवंत ने अपनी पुत्री जामवंत का हाथ भगवान के हाथ में दिया और शर्मवश राजा सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवहा कृष्ण से कर अपने पाप का प्रायश्चित किया.
जब गणेश को ये पता चला तो उन्होंने गणेश चतुर्थी के दिन को भी चन्द्र को श्राप मुक्त कर दिया, इस कारन गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र को देखने से दोष नही लगता है. गणपति बाप्पा मोरेया.
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4>.==भगवान गणेश थे बालब्रह्मचारी, फिर कैसे की दो शादिया?
भगवान गणेश बालब्रह्मचारी थे लेकिन बाद में ऐसा क्या हो गया की उन्होंने एक नही दो दो शादिया की? इसके लिए पौराणो के गर्भ में जाना होगा आपको लेकिन हम है न. सति तुलसी का नाम तो अपने सुना ही होगा जो की जालंधर से ब्याही गई और बाद में भगवान विष्णु के छलावे के चलते उन्हें श्राप दे पत्थर का बना दिया.
इन्ही सति की जब असुरराज जालंधर से शादी नही हुई थी तो उन्होंने एक बार गणेश को देख उन्हें अपने पति रूप में पानी की इच्छा इन्ही बालब्रह्मचारी गणेश से कर दी. बस फिर क्या था भड़क गए गणेश और कर दिया इंकार, इस पर तुलसी ने गणेश को श्राप दिया की जिस ब्रह्मचर्य पे तुम अकड़ रहे हो वो नही रहेगा और तुम्हारी दो दो शादिया होगी, तब गणेश ने भी श्राप दिया की तुम्हारी एक असुर से शादी होगी.
फिर भी शादी तो अपने से नही होती है, तो सुनिए एक बाद दक्षराज अपनी दो बेटियो की शादी को लेकर चिंतित थे तो नारद ने उन्हें शिव पारवती से अपनी चिंता जताने को कहा. चूँकि नारद सब जानते थे की शिव पारवती के तो पुत्र है, ऐसे में दक्षराज अपनी दोनों बेटियो को बहु रूप में स्वीकार करने की विनती महादेव और सति से करने लगा.
लेकिन दोनों बेटियो की एक शर्त भी थी की वो शादी एक ही पुरुष से करेगी, ऐसे में महादेव और पारवती संशय में थे. दोनों ने एक तरीका निकला दोनों पुत्रो को शादी के बारे में बिना बताये ही दोनों में एक प्रतिस्पर्धा रखी जिसका इनाम शादी थी, प्रतियोगिता ये थी को जो भाई पुरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा सात बार सबसे पहले कर के आएगा वही जीतेगा.
कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मोर को तुरंत निकल लिए लेकिन मूषक की सवारी करने वाले गणेश वंही रुके, चूँकि उनका वाहन काफी धीमा था तो उन्होंने बुद्धि का इस्तेमाल किया.
माता पिता को एक चौक्की पे बैठाया और उनके सात परिक्रमा कर जीत का दावा किया. उनका तर्क था की माता पिता की तुलना शास्त्रो में ब्रह्माण्ड से की है तो मैं जीत गया, गणेश की बुद्धिमता देख माता पिता प्रसन्न हुए पर जब कार्तिकेय आया तो इसे छल समझ वंहा से नाराज हो चले गए
तब गणेश को इनाम में शादी मिली जो उनके न चाहने पर भी उन्हें माता पिता की आज्ञा और जीत के तोहफे के रूप में स्वीकार करनी पड़ी सति तुलसी का श्राप भी पूरा हुआ और दक्षराज की समस्या भी. दोनों पत्नियों का नाम ऋद्धि और सिद्धि था, और उनसे शुभ और लाभ नाम के दो पुत्र भी हुए गणेश के, जो आज भी व्यापारियों के लिए प्रथम पूजनीय है.
गणपति बाप्पा मोरया.
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5>कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक
कहते है की इंसान का वर्तमान, उसके पिछले कर्मो पर और भविष्य वर्तमान कर्मों पर आधारित होता है। लेकिन यह बात केवल इंसानो पर ही नहीं अपितु भगवानों पर भी लागू होती है। हमारे पुराणों में अनेक ऐसी कथाएँ है जब भगवान द्वारा अतीत में किये गए अनुचित कार्यों के कारण उन्हें आने वाले समय में कष्ट उठाने पड़े। ऐसी ही एक कहानी भगवान शंकर से सम्बंधित है जब उन्हें कश्यप ऋषि द्वारा दिए गए शाप के कारण अपने ही पुत्र गणेश का मस्तक काटना पड़ा।
भगवान गणेश का जन्म की कहानी :
देवी पार्वती ने एक बार शिवजी के गण नन्दी के द्वारा उनकी आज्ञा पालन में त्रुटि के कारण अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना और किसी की नहीं। देवी पार्वती ने यह भी कहा कि मैं स्नान के लिए जा रही हूं। कोई भी अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शंकर आए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे।
यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया। बालक का हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। देवी पार्वती ने जब यह देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गई। उनकी क्रोध की अग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा।
तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया। तब भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।
कश्यप ऋषि ने दिया था शिव जी को शाप :
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार नारद जी ने श्री नारायण से पूछा कि प्रभु आप बहुत विद्वान है और सभी वेदों को जानने वाले हैं। मैं आप से ये जानना चाहता हूं कि जो भगवान शंकर सभी परेशानियों को दूर करने वाले माने जाते हैं। उन्होंने क्यों अपने पुत्र गणेश की के मस्तक को काट दिया।
यह सुनकर श्रीनारायण ने कहा नारद एक समय की बात है। शंकर ने माली और सुुमाली को मारने वाले सूर्य पर बड़े क्रोध में त्रिशूल से प्रहार किया। सूर्य भी शिव के समान तेजस्वी और शक्तिशाली था। इसलिए त्रिशूल की चोट से सूर्य की चेतना नष्ट हो गई। वह तुरंत रथ से नीचे गिर पड़ा। जब कश्यपजी ने देखा कि मेरा पुत्र मरने की अवस्था में हैं। तब वे उसे छाती से लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओं में हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोर से रुदन करने लगे। अंधकार छा जाने से सारे जगत में अंधेरा हो गया। तब ब्रह्मा के पौत्र तपस्वी कश्यप जी ने शिव जी को शाप दिया वे बोले जैसा आज तुम्हारे प्रहार के कारण मेरे पुत्र का हाल हो रहा है। ठीक वैसे ही तुम्हारे पुत्र पर भी होगा। तुम्हारे पुत्र का मस्तक कट जाएगा।
यह सुनकर भोलेनाथ का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने सूर्य को फिर से जीवित कर दिया। सूर्य कश्यप जी के सामने खड़े हो गए। जब उन्हें कश्यप जी के शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी का त्याग करने का निर्णय लिया। यह सुनकर देवताओं की प्रेरणा से भगवान ब्रह्मा सूर्य के पास पहुंचे और उन्हें उनके काम पर नियुक्त किया।
ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनंद से सूर्य को आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवन चले गए। इधर सूर्य भी अपनी राशि पर आरूढ़ हुए। इसके बाद माली और सुमाली को सफेद कोढ़ हो गया, जिससे उनका प्रभाव नष्ट हो गया। तब स्वयं ब्रह्मा ने उन दोनों से कहा-सूर्य के कोप से तुम दोनों का तेज खत्म हो गया है। तुम्हारा शरीर खराब हो गया है। तुम सूर्य की आराधना करो। उन दोनों ने सूर्य की आराधना शुरू की और फिर से निरोगी हो गए।
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